मुरादाबाद, जून 03 -- उत्तर रेलवे के मुरादाबाद रेल मंडल में ग्रीष्मकालीन छुट्टियों का आनंद लेने की चाहत रेल यात्रियों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम साबित नहीं हो रही है। रेल प्रशासन द्वारा किए गए तमाम दावे और इंतजाम भीड़ के सैलाब के आगे बौने नजर आ रहे हैं। मंडल से गुजरने वाली लंबी दूरी की ट्रेनों में आलम यह है कि आरक्षित कोचों और जनरल डिब्बों के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो गया है। कंफर्म टिकट हाथ में होने के बावजूद यात्री अपनी सीट तक पहुंचने के लिए जंग लड़ रहे हैं, जो भारतीय रेलवे की वर्तमान तैयारियों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

रेलवे ने इस सीजन में लगभग 80 स्पेशल ट्रेनें चलाने और 10 प्रमुख ट्रेनों में अतिरिक्त कोच जोड़ने का निर्णय लिया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये उपाय ऊंट के मुंह में जीरे के समान सिद्ध हो रहे हैं। मंगलवार और बुधवार को मुरादाबाद से गुजरने वाली शहीद एक्सप्रेस, अर्चना एक्सप्रेस, श्रमजीवी और सप्तक्रांति जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनों में दृश्य डराने वाले थे। स्लीपर कोचों के गेट, गलियारे और यहां तक कि शौचालयों के मुहाने तक यात्रियों से पटे हुए थे। भीड़ का दबाव इतना अधिक है कि आरक्षित टिकट वाले यात्री घंटों तक अपनी ही बर्थ तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

इस अव्यवस्था का सबसे मानवीय पहलू तब सामने आया जब लिंक एक्सप्रेस में एक बुजुर्ग महिला को अपनी वैध सीट तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। उनके परिजनों द्वारा 'एक्स' पर शिकायत करने के बाद जब आरपीएफ कर्मियों ने अनधिकृत यात्रियों को हटाया, तब कहीं जाकर उन्हें अपनी बर्थ मिल सकी। यह घटना स्पष्ट करती है कि बिना किसी कड़े प्रवर्तन के, केवल कागजों पर स्पेशल ट्रेनें चला देने से यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

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