नैनीताल , मार्च 11 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर बुधवार को सुनवाई करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया।

मामले में प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल ने जनहित याचिका दायर कर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह की नियुक्ति को निरस्त करने की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुलपति की नियुक्ति में केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विनियम, 2018 के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विनियम, 2018 की विनियम 7.3 के अनुसार कुलपति पद के लिए विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में न्यूनतम 10 वर्ष का अनुभव होना अनिवार्य है, जबकि प्रो. प्रकाश सिंह के पास यह अनुभव नहीं है। याचिका में कहा गया है कि भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) में चेयर प्रोफेसर के रूप में उनका अनुभव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि आईआईपीए न तो कोई विश्वविद्यालय है और न ही यह यूजीसी के मानकों के अनुसार शासित संस्था है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में पात्रता स्पष्ट रूप से "विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष का अनुभव" निर्धारित किया गया है, जिससे किसी अन्य अनुभव को समकक्ष नहीं माना जा सकता है।

याचिकाकर्ता के अनुसार चयन प्रक्रिया के दौरान पात्रता शर्तों में किसी प्रकार का बदलाव या शिथिलता देना उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के विपरीत है। इस तरह की नियुक्ति मनमानी है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

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