अमरोहा , अक्टूबर 08 -- उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास योजना के जरिए एक ओर जहां छोटे-छोटे उद्यमों की नई पौध तैयार हो रही है, वहीं दूसरी ओर पुरानी पहचान से जुड़े बड़े रोजगार केंद्र एक-एक कर बंद होते जा रहे हैं। ऐसे में मुख्य सवाल यह खड़ा हो रहा है कि बंद पड़े बड़े उद्योगों से खत्म हुए रोजगार की भरपाई के लिए कितने नए बड़े औद्योगिक केंद्र स्थापित हो सकेंगे। उपायुक्त उद्योग अनूप श्रीवास्तव के अनुसार योजना के तहत प्राप्त 10,960 आवेदनों में से स्वीकृत 2,748 में से 2,610 इकाइयों को 10.79 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देकर संचालित कराया गया है। प्रति इकाई औसतन पांच लोगों के जुड़ाव के आधार पर इनसे करीब 13,050 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। स्थापित इकाइयों में 70 प्रतिशत लाभार्थी ग्रामीण, 90 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा 30 प्रतिशत महिला उद्यमी हैं, जो रेडीमेड गारमेंट्स, ब्यूटी पार्लर, जन सेवा केंद्र और आटा चक्की जैसे स्थानीय मांग आधारित कारोबार से जुड़ रहे हैं।

हालांकि, इस सकारात्मक बदलाव के समानांतर बड़े औद्योगिक रोजगार केंद्रों की स्थिति चिंताजनक है। दिल्ली-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित गजरौला कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक केंद्र था। समय के साथ शिवालिक सेल्यूलोज (वर्ष 2001 में बंद), बैस्ट बोर्ड, चड्ढा रबर, इंसिल्को, श्री एसिड्स, एसएस ड्रग्स और सिद्धार्थ स्पिन फैब जैसी कई पुरानी इकाइयां बंद हो चुकी हैं। जुबिलेंट समूह, टेवा एपीआई, एएसपी, कैमचूरा और उमंग डेयरी जैसी चालू इकाइयों के बल पर क्षेत्र की औद्योगिक पहचान बनी जरूर है, लेकिन रोजगार का पुराना आधार काफी कमजोर हुआ है।

यही स्थिति अमरोहा-नौगावां सादात मार्ग स्थित कताई मिल और जोया रोड स्थित कुंदन सहकारी चीनी मिल की भी है, जिनके बंद होने से हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई। एक बड़ी फैक्ट्री के बंद होने का असर न सिर्फ प्रत्यक्ष रोजगार बल्कि परिवहन, ठेकेदारी, खानपान व सेवा क्षेत्र से जुड़े पूरे स्थानीय अर्थतंत्र पर पड़ता है।

विभागीय सूत्रों के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में जिले में 3,220 नई इकाइयां स्थापित कर 16,100 अतिरिक्त रोजगार सृजन का लक्ष्य है। हालांकि, सफलता की वास्तविक कसौटी नई इकाइयों की टिकाऊ प्रकृति और बंद पड़े औद्योगिक परिसरों, कताई मिल व चीनी मिल की भूमि के पुनरुपयोग की रणनीति पर निर्भर करेगी।

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