तिरुवनंतपुरम , जून 25 -- केरल के एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ का मानना है कि आधुनिक खुफिया एजेंसियों को अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर साइबर युग की चुनौतियों के हिसाब से खुद को ढालना होगा।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ के एस मनोज ने 'आतंकवाद-रोधी से साइबर लचीलापन तक: खुफिया एजेंसियों को खुद को फिर से क्यों बनाना चाहिए' शीर्षक वाले एक कार्यक्रम में कहा कि साइबर हमलों, एआई, गलत जानकारी वाले अभियान और तेजी से मुश्किल होते जा रहा सीमा-पार खतरा संबंधी नेटवर्क से वैश्विक सुरक्षा का माहौल बदल रहा है।
इस वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया सुरक्षा के बीच का पुराना अंतर तेजी से खत्म हो रहा है। उन्होंने कहा कि वैश्विक सुरक्षा के मामले में अग्रणी देशों के बीच हाल की चर्चाएं, जिसमें ब्रिक्स राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बैठक के दौरान हुई चर्चाएं भी शामिल हैं, यह दिखाती हैं कि पारंपरिक खुफिया ढांचे अब उभरते खतरों से निपटने के लिए नाकाफी हैं।
उन्होंने कहा कि हालांकि आतंकवाद-रोधी, जासूसी और सैन्य खुफिया राष्ट्रीय सुरक्षा के जरूरी हिस्से बने हुए हैं। श्री मनोज ने इस बात पर बल दिया कि आज के कई सबसे बड़े खतरे साइबरस्पेस, जरूरी अवसरंचनाओं में कमजोरियों, सॉफ्टवेयर आपूर्ति श्रृंखला और एआई-सक्षम प्रभाव अभियानों से पैदा होते हैं। उनके अनुसार खुफिया एजेंसियों को ज्यादातर प्रतिक्रिया करने वाले संगठनों से आगे बढ़कर ऐसे पूर्वानुमान करने वाले संस्थानों में अपने को बदलना होगा जो कमजोर सिग्नल की पहचान कर सकें, उभरते जोखिमों का अंदाजा लगा सकें और कार्रवाई करने लायक रणनीतिक दूरदर्शिता दे सकें। उन्होंने कहा कि भविष्य के खतरों का अंदाजा लगाने और उनके लिए तैयारी करने की क्षमता, खुफिया के असरदार होने का एक तय पैमाना बन जाएगी।
श्री मनोज ने जोर देकर कहा कि एआई, मशीन लर्निंग और एडवांस्ड एनालिटिक्स को अब वैकल्पिक प्रौद्योगिकी के तौर पर नहीं, बल्कि आधुनिक खुफिया अभियानों के लिए रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से देखा जाना चाहिए। ये उपकरण एजेंसियों को बहुत अधिक डेटा प्रोसेस करने, छिपे हुए पैटर्न का पता लगाने और तेजी से बदलते खतरों के माहौल में अधिक असरदार तरीके से जवाब देने में मदद कर सकते हैं।
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