वाराणसी , अगस्त 13 -- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों के ऐतिहासिक मुकदमों की साक्षी रही बनारस कचहरी के लाल भवन स्थित ऐतिहासिक अदालत कक्ष में गुरुवार को अधिवक्ताओं ने दीप प्रज्वलित कर धानापुर कांड के स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर अदालत परिसर भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों से गुंजायमान हो उठा।
अधिवक्ताओं ने बताया कि बनारस कचहरी का लाल भवन वह ऐतिहासिक स्थल है, जहां काशी में पहली बार 11 अगस्त 1942 को तिरंगा फहराया गया था। इसी भवन के प्रथम तल पर स्थित अदालत कक्ष में आजादी से पूर्व धानापुर कांड के 71 क्रांतिकारियों के विरुद्ध राजद्रोह, हत्या और लूट समेत विभिन्न आरोपों की सुनवाई हुई थी। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में अदालत कक्ष के बाहर एक शिलालेख भी स्थापित है।
बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय और गौतम झा के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का एक समूह शाम को अदालत कक्ष पहुंचा। उन्होंने शिलालेख के समक्ष चंद्रशेखर आजाद, छत्रपति शिवाजी महाराज और रानी लक्ष्मीबाई के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर दीप प्रज्वलित किए। इस दौरान अधिवक्ता हाथों में तिरंगा लिए हुए थे और "भारत माता की जय", "वंदे मातरम्" तथा "धानापुर के स्वतंत्रता सेनानी अमर रहें" के नारे लगाए।
नित्यानंद राय ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तत्कालीन चंदौली तहसील के धानापुर थाने पर 16 अगस्त 1942 को क्रांतिकारियों ने तिरंगा फहराने का संकल्प लिया था। तिरंगा फहराने के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में तीन स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए थे। इसके बाद क्रांतिकारियों ने जवाबी कार्रवाई में तत्कालीन थानेदार सहित चार पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। इस घटना को काशी का 'चौरी-चौरा कांड' भी कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि धानापुर कांड की सुनवाई के बाद तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नियाज अहमद ने 15 दिसंबर 1944 को फैसला सुनाया था। 71 आरोपितों में से 55 को दोषी ठहराया गया, जबकि 15 को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया था। दोषी ठहराए गए तीन आरोपितों सूर्यमणि सिंह उर्फ मन्नी सिंह, हरिनारायण अग्रहरी और देवसागर सिंह को मृत्युदंड, 16 को आजीवन कारावास, 28 को दस वर्ष के कठोर कारावास, सात को सात वर्ष तथा एक को पांच वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
उन्होंने कहा कि फैसले के लगभग ढाई वर्ष बाद देश की स्वतंत्रता के साथ सभी दोषसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रिहा कर दिए गए। आजादी के साथ मृत्युदंड प्राप्त तीनों क्रांतिकारियों की फांसी भी रुक गई और उन्हें नया जीवन मिला।
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