कोलकाता , जून 17 -- पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने बुधवार को कोलकाता में वैकल्पिक आजीविका व्यवस्था के बिना हॉकरों (फेरीवालों) को बेदखल करने के खिलाफ एक विशाल विरोध रैली का नेतृत्व किया और पार्टी के आंदोलन को सीधे सड़कों पर ले आयीं।

एस्प्लेनेड में हुए इस प्रदर्शन में उनके हजारों समर्थकों और हॉकरों ने हिस्सा लिया। इस दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की कथित 'बुलडोजर राजनीति' को निशाना बनाते हुए नारे लगाये गये। विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों ने 'भाजपा का बुलडोजर तोड़ो', 'हम भाजपा का बुलडोजर स्वीकार नहीं करेंगे' और 'गरीबों पर बुलडोजर के अत्याचार बंद करो' जैसे नारे लगाये।

कई लोग अपने हाथों में तख्तियां लिए हुए थे, जिन पर लिखा था, "मैं एक कामकाजी हॉकर हूं, भाजपा के शासन में बेदखली के बाद अब बेरोजगार हूं।"रैली के दौरान अग्रिम मोर्चे पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहीं सुश्री बनर्जी को समर्थकों के साथ काफी दूरी तक पैदल चलते और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करते देखा गया। उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष और मदन मित्रा सहित कई नेता भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

यह विरोध प्रदर्शन कोलकाता और आसपास के शहरी क्षेत्रों में हाल ही में चलाये गये बेदखली अभियानों को लेकर छोटे व्यापारियों और हॉकरों के बीच बढ़ते गुस्से के बीच हुआ है। तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे का उपयोग अपने राजनीतिक अभियान को तेज करने के लिए किया और तर्क दिया कि हजारों परिवार अपनी आजीविका के लिए सड़क किनारे के व्यवसायों और फुटपाथ के स्टालों पर निर्भर हैं।

पार्टी का रुख था कि यह मुद्दा केवल व्यावसायिक हितों से परे है और लाखों लोगों के अस्तित्व तथा आजीविका से जुड़ा है। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि एक ठोस पुनर्वास योजना के बिना अचानक चलाये गये बेदखली अभियान गरीब परिवारों को बिना किसी आय के छोड़ देंगे और उन्हें आर्थिक तंगी में धकेल देंगे।

विभिन्न हॉकर संगठनों ने भी इस विरोध प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया और एस्प्लेनेड स्थल पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। पार्टी के अनुसार, इस आंदोलन को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं बल्कि आजीविका सुरक्षा, पुनर्वास और बुनियादी मानवाधिकारों के लिए एक व्यापक अभियान के रूप में देखा जाना चाहिए।

सुश्री बनर्जी ने इससे पहले बेदखली अभियानों की आलोचना की थी और वर्तमान शासन पर प्रभावित लोगों को पर्याप्त कानूनी अवसर दिए बिना तानाशाही तरीके से काम करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि मौजूदा कानूनी प्रावधान तत्काल बेदखल करने के बजाय अनियमितताओं के मामलों में जुर्माने या सुधारात्मक उपायों की गुंजाइश देते हैं।

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