नयी दिल्ली , जनवरी 12 -- देश के बैंकिंग क्षेत्र में कोरोना काल के बाद तेजी से सुधार देखने को मिला है और परिसंपत्तियों, जमा तथा ऋण में तीव्र विस्तार देखा गया है।
भारतीय स्टेट बैंक की अनुसंधान इकाई एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जमा की तुलना में ऋण देने की बढ़ती गति पूंजी की उपलब्धता और जोखिम संबंधी चिंताओं को भी बढ़ा रही है।
कई वर्षों की धीमी वृद्धि के बाद बैंकों की परिसंपत्तियों में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। यह वित्त वर्ष 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 77 प्रतिशत था जो 2024-25 तक बढ़कर 94 प्रतिशत तक पहुंच गयी।
दीर्घावधि परिप्रेक्ष्य में बैंकिंग प्रणाली का आकार कई गुना बढ़ा है। कुल परिसंपत्तियां वित्त वर्ष 2004-05 में 23.6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 312 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गयी हैं, जो आर्थिक विस्तार में बैंकों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
पिछले दो दशकों में जमा और ऋण में भी तेज वृद्धि हुई है। जमा 2004-05 में 18.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 241.5 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि ऋण इसी अवधि में 11.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 191.2 लाख करोड़ रुपये हो गये।
विशेष रूप से, वित्त वर्ष 2020-21 के बाद से ऋण वृद्धि ने जमा वृद्धि को पीछे छोड़ दिया है, जिससे पूरे तंत्र का ऋण-जमा अनुपात 2020-21 में 69 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 79 प्रतिशत हो गया है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बाजार हिस्सेदारी में अब सुधार दिखने लगा है। बैलेंस शीट पर कई वर्षों के दबाव के बाद इन बैंकों ने ऋण उठाव में अपनी हिस्सेदारी फिर से हासिल करनी शुरू कर दी है, जो बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत पूंजी स्थिति और ऋण देने की नयी इच्छा को दर्शाता है।
विश्लेषण में असुरक्षित ऋणों में तेज वृद्धि को प्रमुख चिंता बताया गया है। असुरक्षित ऋण वित्त वर्ष 2004-05 के दो लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 47 लाख करोड़ रुपये हो गये हैं, जिससे कुल ऋण में इनकी हिस्सेदारी दो दशक पहले के 17.7 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 24.5 प्रतिशत हो गयी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इस जोखिम का लगभग आधा हिस्सा वहन कर रहे हैं। अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी पर्याप्तता में सुधार हुआ है। निजी क्षेत्र के बैंक समग्र रूप से अधिक पूंजी बफर बनाए हुए हैं।
एसबीआई रिसर्च का कहना है कि बैंकिंग रोजगार की संरचना में भी बड़ा बदलाव आया है। कुल रोजगार दो दशकों में लगभग दोगुना हो गया है, जिसमें अधिकारियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। साथ ही, बैंकों की आकस्मिक देनदारियां 20 साल में लगभग 18 गुना बढ़ गई हैं, जिसका प्रमुख कारण लंबित फॉरवर्ड विदेशी मुद्रा अनुबंध हैं।
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