नयी दिल्ली , मार्च 13 -- उच्चतम न्यायालय शुक्रवार को भ्रष्टाचार के आरोपी लोक सेवकों के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने और मुकदमा शुरू करने के लिए जांच एजेंसियों को दी जाने वाली मंजूरी को नियंत्रित करने वाले कानूनी संरचना की जांच करने पर सहमत हो गया है।
यह मामला लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की धारा 20 के तहत भ्रष्टाचार के आरोपी लोक सेवकों के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने और मुकदमा शुरू करने के लिए जांच एजेंसियों को दी जाने वाली मंजूरी से संबंधित है।
न्यायालय ने 'कैश-फॉर-क्वेरी' मामले में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ चल रही जांच पर भी फिलहाल के लिए रोक लगा दी है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने तृणमूल नेता महुआ मोइत्रा, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और भाजपा नेता निशिकांत दुबे को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
श्री दुबे ने ही सबसे पहले ये आरोप लगाया था कि मोइत्रा ने कथित तौर पर संसद में सवाल उठाने के बदले लाभ स्वीकार किये थे।
लोकपाल की याचिका में उठाये गये मुद्दे की समीक्षा करने पर सहमति जताते हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, "हम लोकपाल की शक्तियों और उन पर लागू होने वाली कानूनी सीमाओं को विस्तार से तय करेंगे।"यह मामला तब शीर्ष अदालत पहुंचा, जब भारत के लोकपाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पिछले साल दिसंबर के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें सुश्री मोइत्रा के खिलाफ सीबीआई को आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देने के लोकपाल के निर्णय को रद्द कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने माना था कि लोकपाल की मंजूरी लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत थी और भ्रष्टाचार विरोधी संस्था (लोकपाल) को मंजूरी के प्रश्न पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
धारा 20 के तहत अपनी शक्तियों के दायरे पर स्पष्टता की मांग करने वाली लोकपाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने संकेत दिया कि इस प्रावधान की आधिकारिक व्याख्या की आवश्यकता है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि वह लोक सेवक के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरी देने के मामले में लोकपाल के अधिकार और उस पर लागू सीमाओं की सीमा तय करने के लिए वैधानिक योजना का विस्तार से परीक्षण करेगी।
न्यायालय ने कहा कि जब तक यह मुद्दा सुलझ नहीं जाता, वह सुश्री महुआ मोइत्रा के मामले में अभियोजन को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं देगी।
अदालत ने लोकपाल को उच्च न्यायालय के उस निर्देश का पालन करने से भी रोक दिया, जिसमें एक निश्चित समय सीमा के भीतर नया निर्णय लेने को कहा गया था।
खंडपीठ ने इस बात पर गौर किया कि यह विवाद मुख्य रूप से लोकपाल अधिनियम के तहत 'मंजूरी तंत्र' की व्याख्या और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं आपराधिक प्रक्रिया कानून के साथ इसके तालमेल से जुड़ा है।
यह मामला उन आरोपों से उपजा है, जिनमें कहा गया था कि सुश्री मोइत्रा ने संसद में सवाल पूछने के बदले दुबई स्थित व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी से नकद और महंगे उपहार लिए थे।
निशिकांत दुबे की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए लोकपाल ने पहले सीबीआई को मामले की जांच करने का निर्देश दिया था और बाद में एजेंसी को आरोप पत्र दाखिल करने की मंजूरी दी थी।
सुश्री महुआ मोइत्रा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में इस मंजूरी को चुनौती दी थी। उनकी दलील थी कि लोकपाल ने धारा 20 के तहत प्रक्रिया का पालन नहीं किया और उनके पक्ष पर उचित विचार किये बिना ही मंजूरी दे दी। उच्च न्यायालय ने उनकी इस दलील को स्वीकार करते हुए मंजूरी के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद लोकपाल को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा था।
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