कोच्चि , मार्च 24 -- केरल में अमृता अस्पताल ने श्वसन चिकित्सा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक प्रगति करते हुए राज्य की पहली बायोडिग्रेडेबल एयरवे स्टेंटिंग प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न किया है।

अमृता अस्पताल इस उपलब्धि के साथ राज्य का पहला और भारत का तीसरा ऐसा केंद्र बन गया है, जिसने 'पोस्ट-ट्यूबरकुलोसिस ब्रोंकियल स्टेनोसिस' (टीबी के बाद श्वास नली में रुकावट) के इलाज के लिए इस अत्याधुनिक तकनीक को अपनाया है। इस अभूतपूर्व प्रक्रिया का नेतृत्व अस्पताल के 'इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी और कॉम्प्लेक्स एयरवे डिसऑर्डर' विभाग ने किया।

लगभग आठ घंटे तक चली इस अत्यंत जटिल ब्रोंकोस्कोपिक हस्तक्षेप प्रक्रिया को दो युवतियों पर आजमाया गया, जो सांस की नली में गंभीर रुकावट से जूझ रही थीं। इस उपचार के बाद उनके सामान्य रूप से सांस लेने की प्रक्रिया बहाल हो गयी है। इस अनुसंधान की मुख्य विशेषता बायोडिग्रेडेबल स्टेंट का उपयोग है। ये स्टेंट अपना काम पूरा करने के बाद शरीर के भीतर प्राकृतिक रूप से घुल जाते हैं। एक बार जब श्वास नली की रुकावट दूर हो जाती है, तो ये स्टेंट धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। इससे मरीज को दोबारा सर्जरी कराने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे उन्हें काफी आराम मिलता है और भविष्य के परिणाम भी बेहतर होते हैं।

अमृता अस्पताल में इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी के प्रमुख डॉ. टिंकू जोसेफ ने कहा कि उन्नत तकनीक और कुशल मेडिकल टीम के समन्वित प्रयासों से ही यह दुर्लभ और जटिल प्रक्रिया संभव हो पायी है। इस टीम में डॉ. डॉन जोस और डॉ. श्रीराज नायर भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि बायोडिग्रेडेबल एयरवे स्टेंटिंग विशेष रूप से टीबी के बाद नसों के सिकुड़ने, पुरानी खांसी, बलगम जमा होने, सांस फूलने और श्वास नली से संबंधित अन्य विकारों के इलाज में अत्यधिक प्रभावी है। यह अनुसंधान केरल के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक बड़ा कदम है, जो श्वसन संबंधी जटिल बीमारियों से पीड़ित रोगियों के लिए नयी उम्मीद लेकर आया है।

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