बेंगलुरु , अक्टूबर 20 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) की सदस्य डॉ. शांता होसमनी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। उन पर कर्नाटक प्रशासनिक सेवा (केएएस) भर्ती साक्षात्कार में एक उम्मीदवार को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए अवैध रूप से रिश्वत लेने का आरोप है।

न्यायमूर्ति एस विश्वजीत शेट्टी ने उनकी आपराधिक याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष की सामग्री प्रथम दृष्टया दर्शाती है कि उन्होंने अवैध लाभ के लिए अपने सरकारी पद का दुरुपयोग किया था।

न्यायालय ने कहा कि इस तरह के कृत्यों से भर्ती प्रणाली में जनता का विश्वास डगमगाता है और मेधावी उम्मीदवार नियुक्ति के अवसरों से वंचित रह जाते हैं।

न्यायालय ने टिप्पणी की, "ऐसे कार्यों से व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठता है और हजारों छात्र, जो मेधावी हैं, वे नियुक्तियों से वंचित रह जाते हैं।" इसके साथ ही न्यायालय ने जोर देकर कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

न्यायालय ने संस्था के भीतर और बाहर अन्य लोगों की संभावित संलिप्तता का पर्दाफाश करने, लाभ पाए उम्मीदवारों की पहचान करने और इस पूरे तौर-तरीके का पता लगाने के लिए गहन जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।

ऑल-कर्नाटक स्टेट स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष कंथाकुमार आर की शिकायत के बाद विधान सौध पुलिस ने यह मामला दर्ज किया था। फिलहाल आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) इस मामले की जांच कर रहा है।

प्राथमिकी के अनुसार, होसमनी साक्षात्कार समिति की सदस्य थीं और उन्होंने केएएस भर्ती परीक्षा में शामिल हुए एक उम्मीदवार से घूस की रकम स्वीकार की थी। यह मामला आठ मई को आयोजित साक्षात्कार से संबंधित है। उनके खिलाफ 'कर्नाटक सार्वजनिक परीक्षा (भर्ती में भ्रष्टाचार और अनुचित साधनों की रोकथाम के उपाय) अधिनियम, 2023' की धारा 10 लगाई गई है। इस प्रावधान के तहत अधिकतम 12 वर्ष की कैद की सजा का प्रावधान है।

इससे पहले 10 सितंबर को सत्र न्यायालय ने होसमनी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस विवेक रेड्डी ने दलील दी कि होसमनी एक डॉक्टर हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है तथा उन्होंने जांच में सहयोग किया है। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री जुटा नहीं पाई है, इसलिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने तर्क दिया कि होसमनी और उम्मीदवार ने जांच में सहयोग नहीं किया। सरकार ने एक-दूसरे से जान-पहचान को लेकर दोनों के बयानों में मौजूद विरोधाभासों की ओर भी इशारा किया।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि संस्था के भीतर और बाहर अन्य लोगों की संभावित संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए विस्तृत जांच आवश्यक है।

केपीएससी ने सीलबंद लिफाफे में उम्मीदवारों के अंकों को दर्शाने वाला एक चार्ट पेश किया था, क्योंकि चयन सूची अभी प्रकाशित नहीं हुई थी। इस चार्ट में मामले के दूसरे आरोपी उम्मीदवार के अंक भी शामिल थे।

हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता न होने के तर्क को अग्रिम जमानत का आधार मानने से इनकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि जजों को आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, समाज पर उनके प्रभाव, तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ या आरोपी द्वारा जांच को प्रभावित करने की संभावना पर भी विचार करना चाहिए।न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत खारिज होने का अपने आप यह मतलब नहीं है कि आरोपी को हिरासत में लिया ही जाना चाहिए।

न्यायालय ने कहा कि जांच अधिकारी को यह तय करने से पहले कि हिरासत में पूछताछ जरूरी है या नहीं, एकत्र की गई सामग्री, मामले की परिस्थितियों और आरोपी के आचरण का निष्पक्ष रूप से आकलन करना चाहिए।

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