नयी दिल्ली , फरवरी 12 -- राष्ट्रीय राजधानी स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का विदेशी केंद्र थाईलैंड के बैंकॉक स्थित सिल्पकॉर्न विश्वविद्यालय के संस्कृत अध्ययन केंद्र में स्थापित किया जायेगा। यह महत्वपूर्ण सफलता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी और कुलसचिव प्रो. आरजी मुरलीकृष्ण ने थाईलैंड (बैंकॉक) यात्रा के दौरान एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर के बाद मिली है।

उल्लेखनीय है कि पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के कार्यकाल में सिल्पकॉर्न विश्वविद्यालय में संस्कृत अध्ययन केंद्र की स्थापना की गयी थी। वर्तमान पहल उसी दूरदर्शी प्रयास को संस्थागत स्वरूप प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रयास केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में विदेशों में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रसार की नीति को और सशक्त करेगा।

दोनों विश्वविद्यालयों के मध्य निम्न बिंदुओं पर सहमति से बनी हैं, जिनमें संकाय एवं छात्र विनिमय कार्यक्रम संयुक्त शिक्षण, शोध एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान को संस्थागत रूप, दूरस्थ शिक्षा पहल, थाईलैंड एवं आसियान देशों के विद्यार्थियों के लिए संस्कृत, पालि, हिंदी एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित ऑनलाइन पाठ्यक्रम शामिल हैं।

संयुक्त उपाधि कार्यक्रम विद्यार्थियों को भारत एवं थाईलैंड में अध्ययन का अवसर मिलेगा, जिसके अंतर्गत स्नातकोत्तर एवं शोध सहयोग रामायण अध्ययन, संस्कृत अभिलेख विज्ञान, बौद्ध अध्ययन आदि में विशेष पाठ्यक्रम एवं संयुक्त पीएचडी संभव होगा।

इसके साथ ही योग विज्ञान, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष, ब्राह्मी लिपि तथा पाली-बौद्ध अध्ययन पर संयुक्त संगोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं प्रकाशनों की योजना बनायी गयी है।

प्रस्तावित केंद्र में डिजिटल संस्कृत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत पालि, प्राकृत एवं पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण, ई-संसाधनों का निर्माण तथा संयुक्त शोध प्रकाशन को बढ़ावा दिया जाएगा।

इस दौरान थाईलैंड स्थित भारतीय दूतावास में पौलोमी त्रिपाठी (डिप्टी चीफ ऑफ मिशन एवं डिप्टी परमानेंट डेलीगेट टू यूनेस्को) से भेंट हुई। उन्होंने थाइलैंड के विश्वविद्यालयों एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के बीच प्रस्तावित समझौते को संस्थागत समर्थन, संकाय विनिमय, छात्रवृत्ति सुविधा, संस्कृत विकास योजना के अंतर्गत पुस्तक प्रदान तथा शैक्षणिक सहयोग को प्रोत्साहन देने के लिए मंथन हुआ। यह पहल दक्षिण-पूर्व एशिया में संस्कृत, पालि और बौद्ध अध्ययन के विस्तार का आधार बनेगी तथा दोनों देशों के बीच शिक्षा का एक 'स्वर्णिम अध्याय' प्रारंभ करेगी।

कुलपति प्रो. वरखेड़ी ने महिदोल विश्वविद्यालय के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर लैंग्वेज एंड कल्चर ऑफ एशिया स्थित भारत अध्ययन केंद्र का भी दौरा किया। यहां संस्कृत, पालि एवं भारतीय इतिहास पर चल रहे शोध कार्यों की समीक्षा की गयी तथा संयुक्त शोध परियोजनाओं, सेमिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अकादमिक चर्चा की गयी। महामकुट बौद्ध विश्वविद्यालय के मध्य संभावित शैक्षणिक सहयोग के विविध आयामों पर विस्तृत चर्चा हुई। इस अवसर पर कई गणमान्य विद्वान मौजूद थे।

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