नयी दिल्ली , अगस्त 27 -- केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उद्योगों से अपील करते हुए कहा है कि कि वे एक गांव को केवल अपनाने के बजाय उसे जलवायु-स्मार्ट और आत्मनिर्भर गांव बनाने की दिशा में काम करें। कार्बन क्रेडिट को किसानों की आय से जोड़ने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और ग्रामीण रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

वह यहां आयोजित सीआईआई-आईटीसी 21वीं ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी समिट के विशेष सत्र 'रूरल प्रॉस्पेरिटी फॉर विकसित भारत : एडवांसिंग सस्टेनेबल एग्रीकल्चर एंड इन्क्लूसिव ग्रोथ' को संबोधित कर रहे थे। श्री चौहान ने कहा कि सरकार और उद्योग मिलकर किसानों की क्षमता बढ़ाएंगे तो कृषि की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी। गांव समृद्ध होंगे तो बाजार का विस्तार होगा, उद्योगों को बेहतर आधार मिलेगा और देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।

यह जानकारी यहां जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में दी गयी।

सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने सतत कृषि, जल एवं मिट्टी संरक्षण, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और किसान-उद्योग साझेदारी को ग्रामीण समृद्धि का मुख्य आधार बताया। उन्होंने कहा कि सतत कृषि केवल एक पर्यावरण संबंधी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की है, लेकिन बदलते जलवायु संकट के बीच अब उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण दोनों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने किसानों से मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक सलाह के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद और प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान किया, साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों के माध्यम से जल संरक्षण पर जोर दिया।

केंद्रीय मंत्री ने किसानों को केवल एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने की सलाह दी। इसके तहत अनाज के साथ-साथ फल, सब्जी, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी जैसी गतिविधियों को जोड़ने पर बल दिया गया, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को वर्षभर आय के अवसर मिल सकें। उन्होंने जलवायु-स्मार्ट कृषि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि देश के विभिन्न जिलों के लिए जलवायु जोखिमों का आकलन कर विशेष कृषि सलाह और कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं। उन्होंने ड्रोन, उपग्रह निगरानी, डिजिटल सलाह और आधुनिक तकनीकों को "लैब टू लैंड" की अवधारणा के तहत सीधे छोटे और सीमांत किसानों के खेतों तक पहुँचाने की आवश्यकता जताई।

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