बारां , सितम्बर 12 -- राजस्थान में बारां नगर परिषद के 60 वार्डों में नौ सितंबर को मतदान के बाद अब बारां शहर में एक ही सवाल गूंज रहा है कि इस बार कौन बाजी मारेगा।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में बंद मतपत्रों ने प्रत्याशियों की किस्मत पर ताला लगा दिया है लेकिन शहर की सियासत में चुनावी गणित खुलकर बाहर आ गया है। चौराहों, चाय की थड़ियों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक एक ही सवाल घूम रहा है, बारां में बोर्ड किसका बनेगा और सभापति की कुर्सी पर किसके सिर ताज सजेगा।
आगामी 14 सितंबर को होने वाली मतगणना इस सवाल का जवाब देगी लेकिन उससे पहले कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आप और निर्दलीयों के समर्थक अपने-अपने आंकड़े सामने रखकर जीत के दावे कर रहे हैं। इस बार मुकाबला इतना उलझा हुआ है कि नतीजों से पहले किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट तस्वीर बनाना मुश्किल है।
कांग्रेस समर्थक नगर परिषद में 30 से अधिक सीटें आने का दावा कर रहे हैं। वहीं भाजपा खेमे में भी बोर्ड बनाने को लेकर आत्मविश्वास है। चुनावी आकलनों में भाजपा को करीब 18 से 20 या उससे अधिक सीटें मिलने की चर्चा है लेकिन इस बार चुनाव का सबसे बड़ा पेंच आम आदमी पार्टी के रूप में उभरे तीसरे मोर्चा ने फँसाया है। शहर के कई वार्डों में आप को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आ रहे हैं। कहीं 10 से 15 सीटों की चर्चा है तो आप समर्थक 20 से अधिक सीटों तक का दावा कर रहे हैं।
यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाली सीधी राजनीतिक लड़ाई इस बार कई वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबले में बदल गई। आप की संभावित सेंध ने दोनों प्रमुख दलों का चुनावी गणित उलझा दिया है।
बारां की शहरी राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे जातीय और सामाजिक वोट समीकरण इस चुनाव में कितने प्रभावी रहे, इसका पता नतीजों के बाद ही चलेगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आप के मजबूत होने से उन मतों में भी बंटवारे की संभावना बनी है, जिन्हें अब तक किसी एक दल का अपेक्षाकृत मजबूत आधार माना जाता रहा है। कई वार्डों में मुकाबला बेहद नजदीकी माना जा रहा है। कुछ वार्डों में मामूली वोटों का अंतर पूरे बोर्ड के समीकरण को बदल सकता है।
चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर ताकत झोंकी। भाजपा की ओर से विधायक राधेश्याम बैरवा और जिलाध्यक्ष नरेश सिकरवार चुनावी मैदान में सक्रिय रहे। वहीं पूर्व सभापति कमल राठौर आप प्रत्याशियों के पक्ष में वार्डवार सक्रिय नजर आए।
कांग्रेस की ओर से विधायक प्रमोद जैन भाया और पूर्व विधायक पानाचंद मेघवाल ने चुनावी रणनीति को संभाले रखा। वार्डों से जानकारी लेने के साथ आमसभाओं और जनसंपर्क के जरिए मतदाताओं के बीच पहुंच बनाई गई।
अब इन नेताओं की चुनावी रणनीति कितनी सफल रही, इसका फैसला भी 14 सितंबर को ईवीएम खुलने के साथ सामने आएगा।
शहर में मतदाताओं से बातचीत के आधार पर अलग-अलग वार्डों के अलग-अलग नतीजे बताए जा रहे हैं। कोई कांग्रेस को आगे बता रहा है तो कहीं भाजपा की बढ़त का दावा किया जा रहा है। कई वार्डों में आप और निर्दलीयों को मजबूत बताया जा रहा है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिसे आज बढ़त मिलती दिखाई दे रही है, जरूरी नहीं कि मतगणना के बाद तस्वीर भी वही रहे।
कई वार्डों में कम अंतर से हार-जीत होने का अनुमान है। ऐसे में कुछ वार्डों का परिणाम पूरे नगर परिषद बोर्ड की दिशा तय कर सकता है।
चुनाव परिणाम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि कांग्रेस या भाजपा में से किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो सत्ता की चाबी किसके हाथ जाएगी। ऐसी स्थिति में आप और निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। यही पार्षद बोर्ड बनाने और सभापति चुनने के लिए मुख्य किरदार की भूमिका में आ सकते हैं।
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