वाराणसी , अक्टूबर 10 -- काशी के जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. रजनीकांत की पहल पर गुजरात के मेहसाणा जिले के पारंपरिक हथकरघा उत्पाद को भौगोलिक संकेतक (जीआई) प्रदान करने के लिए आवेदन दाखिल किया गया है। इसका उद्देश्य उत्तर गुजरात की पारंपरिक बुनाई कला और पीढ़ियों से चले आ रहे बुनकरों के कौशल का संरक्षण एवं संवर्धन करना है।

डॉ. रजनीकांत के अनुसार, नाबार्ड और गांधीनगर स्थित उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआईआई) के सहयोग से यह पहल पूरी की गई। उन्होंने बताया कि जीआई संरक्षण अभियान के तहत देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 650 उत्पादों के लिए आवेदन किए जा चुके हैं। गुजरात के 15 पारंपरिक उत्पादों, शिल्प, हथकरघा और आदिवासी कलाओं के लिए भी आवेदन किए गए हैं, जिनमें से आठ को जीआई मिल चुका है। इनमें सूरत का हीरा भी शामिल है।

मेहसाणा की हथकरघा परंपरा का संबंध ऐतिहासिक नगर वडनगर और आसपास के बुनकर क्षेत्रों से है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों में इस क्षेत्र में हथकरघा बुनाई और मशरू वस्त्र निर्माण का उल्लेख मिलता है। मेहसाणा के रिदरोल, नारदीपुर और लींच सहित विभिन्न क्षेत्रों में बुनकर सूती चादरें, तौलिए, बेडकवर और अन्य वस्त्र तैयार करते हैं।

डॉ. रजनीकांत ने कहा कि जीआई पंजीकरण से इस पारंपरिक विरासत को पहचान दिलाने तथा स्थानीय कारीगरों की आजीविका को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।

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