वाराणसी , अगस्त 5 -- काशी में पातालपुरी सनातन धर्म रक्षा परिषद एवं विशाल भारत संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्रीराम परिवार गाथा के सातवें दिन बुधवार को पातालपुरी मठ में "राम के राज्य विस्तार नहीं, राष्ट्र धर्म की स्थापना" विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति बिहारी लाल शर्मा ने दीप प्रज्वलित कर किया।

संगोष्ठी में ओडिशा की शोधार्थी प्रज्ञा परमिता महारी ने अपने शोधपत्र में कहा कि युद्ध हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, क्योंकि इससे सबसे अधिक सैनिक, प्रजा और आम नागरिक प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने सदैव प्रजा की सुरक्षा को प्राथमिकता दी और व्यक्तिगत हितों को पीछे रखा।

उन्होंने कहा कि लंका विजय के बाद भगवान राम चाहते तो लंका को अयोध्या के राज्य में मिला सकते थे, लेकिन उन्होंने रावण के भाई विभीषण को ही वहां का राजा बनाया। इतिहास में अनेक शासकों ने राज्य विस्तार के लिए व्यापक रक्तपात किया, जबकि राम ने शांति और व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से स्थानीय शासन व्यवस्था को ही बनाए रखा। उन्होंने कहा कि विजित राज्य लौटाकर राम ने यह संदेश दिया कि किसी भी जाति, संस्कृति, भाषा अथवा राज्य की पहचान को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने केवट प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि ओडिशा में आज भी भगवान राम के चरणरज प्राप्त करने वाले केवट समुदाय को सौभाग्यशाली माना जाता है।

मुख्य अतिथि बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भगवान राम की नीति सभी के संरक्षण की थी, किसी को समाप्त करने की नहीं। उन्होंने कहा कि राम ने विजित राज्यों और शत्रु पक्ष के परिवारों को भी संरक्षण प्रदान किया।

मुख्य गाथाकार जगद्गुरु बालक देवाचार्य ने कहा कि इतिहास में अनेक आक्रमणकारियों ने जिन क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की, वहां की संस्कृति, समाज और धार्मिक पहचान को बदलने का प्रयास किया। इसके विपरीत भगवान राम ने यह संदेश दिया कि विजय का अर्थ किसी राज्य, जाति अथवा संस्कृति का विनाश नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि विश्व राम की नीतियों का अनुसरण करे तो संघर्षों में कमी आएगी और विविध संस्कृतियों का संरक्षण संभव होगा।

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