वाराणसी , फरवरी 21 -- धार्मिक नगरी काशी में मणिकर्णिका घाट पर आयोजित होने वाली 'चिता भस्म की होली' विवादों में घिर गई है। 28 फरवरी को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर प्रस्तावित इस आयोजन का काशी विद्वत परिषद, अखिल भारतीय संत समिति तथा विभिन्न विद्वानों ने कड़ा विरोध किया है।
विद्वानों का कहना है कि श्मशान घाट पर उत्सव मनाना, हुड़दंग करना तथा तेज आवाज में गीत-संगीत बजाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। चिता भस्म होली के आयोजक गुलशन कपूर ने दावा किया कि यह काशी की प्राचीन परंपरा है। उनका कहना है कि विरोध करने वाले लोग विद्वान नहीं हैं। मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ और मां गौरा के साथ काशीवासी तथा देश-विदेश के लोग होली खेलते हैं, लेकिन बाबा के प्रिय गण भूत, प्रेत, पिशाच सामान्य मनुष्यों के साथ होली नहीं खेल सकते।
प्राचीन मान्यता है कि एकादशी के दूसरे दिन, द्वितीया तिथि को बाबा अपने प्रिय गणों के साथ श्मशान घाट पर चिता भस्म की होली खेलते हैं। सोशल मीडिया के कारण 'मसान की होली' विश्वविख्यात हो गई है और देश-विदेश से लोग इसे देखने आते हैं। आयोजक का आरोप है कि इसी कारण कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री प्रो. विनय पांडेय ने बताया कि 'मसान की होली' कुछ वर्षों से काशी में देखने को मिल रही है, जो बिल्कुल शास्त्र-सम्मत नहीं है। यह सनातन परंपरा को विकृत कर रही है तथा समाज में विकृतियां पैदा कर रही है। काशी विद्वत परिषद इसका पुरजोर विरोध करता है।
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