जालौन , जुलाई 14 -- उत्तर प्रदेश में जालौन जिले की कालपी तहसील स्थित यमुना के दक्षिणी तट पर बसे गुलौली गांव के प्राचीन भग्नावशेष एक बार फिर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच चर्चा का विषय बन गए हैं।
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरीमोहन पुरवार ने दावा किया है कि गुलौली में मौजूद खंडहर प्राचीन कालप्रियनाथ सूर्य मंदिर के अवशेष हैं, जिसका उल्लेख भविष्य पुराण, वराह पुराण, महाकवि भवभूति के नाटकों, राष्ट्रकूट अभिलेखों तथा अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। उनका कहना है कि यदि इस क्षेत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए तो महाभारत, कुषाण और गुप्तकालीन इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं।
डॉ. पुरवार ने बताया कि कालपी के पूर्व स्थित गुलौली गांव यमुना के दक्षिणी तट पर बसा है और यहीं प्राचीन कालप्रियनाथ सूर्य मंदिर स्थित था। वर्तमान में मंदिर के केवल भग्नावशेष और टीले शेष हैं, लेकिन उपलब्ध साहित्यिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य इस स्थल की प्राचीनता और महत्व की पुष्टि करते हैं।
उन्होंने कहा कि सूर्योपासना मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक रही है। ऋग्वेद सहित समस्त वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, पुराणों तथा संस्कृत और प्राकृत साहित्य में सूर्य के महत्व का विस्तार से उल्लेख मिलता है। भारतीय राजाओं द्वारा जारी प्राचीन आहत सिक्कों पर सूर्य चक्र का अंकन भी इस परंपरा का प्रमाण है।
डॉ. पुरवार ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को श्रापवश कुष्ठ रोग हो गया था। नारद मुनि के परामर्श पर उन्होंने सूर्यदेव की कठोर आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें रोगमुक्त किया और तीन स्थानों पर अपनी प्रतिमाएं स्थापित करने का निर्देश दिया। इनमें पूर्व दिशा का उदयाचल, पश्चिम का मूलस्थान (वर्तमान मुल्तान) तथा यमुना के दक्षिणी तट पर स्थित कालप्रिय शामिल था। इतिहासकारों के अनुसार यही कालप्रिय वर्तमान कालपी है।
उन्होंने कहा कि भविष्य पुराण में भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि मध्यान्ह के समय सूर्यदेव का सान्निध्य कालप्रिय में प्राप्त होता है। यही कारण है कि कालपी को प्राचीन सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
डॉ. पुरवार के अनुसार संस्कृत के महान नाटककार महाकवि भवभूति ने अपने तीनों नाटकों महावीरचरित, मालती-माधव तथा उत्तररामचरित की प्रस्तावनाओं में भगवान कालप्रियनाथ के मेले और वहां एकत्रित विद्वानों का उल्लेख किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि इन नाटकों का प्रथम मंचन कालपी स्थित कालप्रियनाथ मंदिर परिसर में हुआ होगा।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय के प्रसिद्ध कैम्बे ताम्रपत्र में भी कालप्रियनाथ मंदिर का उल्लेख मिलता है। इस अभिलेख में मंदिर प्रांगण की भव्यता तथा उस समय हुए सैन्य अभियान का वर्णन किया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह मंदिर तत्कालीन भारत का प्रतिष्ठित धार्मिक केंद्र था।
डॉ. पुरवार ने बताया कि मंदिर क्षेत्र से एक अलंकृत पाषाण खंड प्राप्त हुआ है, जिस पर बेल-बूटों तथा ध्यानमग्न तपस्वियों की आकृतियां उकेरी गई हैं। इसके अतिरिक्त समीप स्थित 'मोदी टीला' से बड़ी संख्या में प्राचीन मृणपात्र और उनके अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिन्हें बुंदेलखंड संग्रहालय, उरई में सुरक्षित रखा गया है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय संग्रहालय झांसी के विशेषज्ञ रुद्र किशोर पाण्डेय ने इन मृणपात्रों की शैली को कुषाण एवं गुप्तकालीन बताया है। वहीं प्रख्यात इतिहासकार डॉ. वी.वी. मिराशी ने भी कालपी के काल्पदेव टीले को कालप्रियनाथ मंदिर का संभावित स्थल माना है। इन तथ्यों से यह संभावना मजबूत होती है कि मंदिर का अस्तित्व कम से कम कुषाण और गुप्तकाल में अवश्य था।
प्रख्यात इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी का भी मानना रहा है कि ऋग्वेद से लेकर परवर्ती संस्कृत साहित्य तक सूर्य की उपासना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। उनके अनुसार सूर्य के विभिन्न नाम सविता, आदित्य, विवस्वान, भानु, प्रभाकर और कालप्रियनाथ सूर्य आराधना की समृद्ध परंपरा के प्रतीक हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि कालप्रिय की पहचान वर्तमान कालपी से जोड़ने वाले साहित्यिक और ऐतिहासिक संकेतों की गंभीरता से पुरातात्विक जांच होनी चाहिए।
डॉ. पुरवार का कहना है कि यदि एएसआई द्वारा गुलौली स्थित प्राचीन टीले और मंदिर परिसर का वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए तो महाभारत, कुषाण और गुप्तकालीन समाज, संस्कृति, स्थापत्य, व्यापार और धार्मिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं। उनका मानना है कि यह खोज न केवल बुंदेलखंड बल्कि पूरे भारतीय इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगी।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर आज विश्व धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार कालपी का कालप्रियनाथ सूर्य मंदिर भी प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूर्योपासना केंद्र रहा होगा। व्यवस्थित पुरातात्विक अनुसंधान से काल की परतों में दबी यह ऐतिहासिक धरोहर पुनः प्रकाश में आ सकती है और भारतीय इतिहास के अनेक अनछुए अध्यायों पर नई रोशनी डाल सकती है।
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