नयी दिल्ली , नवंबर 09 -- भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने रविवार को कानूनी सहायता आंदोलन में जमीनी स्तर पर सहानुभूति और जवाबदेही की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

न्यायमूर्ति गवई ने आज यहां आयोजित 'कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मज़बूत बनाने' पर राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र संबोधित करते हुए कहा कि कानूनी सहायता तंत्र को मजबूत बनाने के लिए संस्थागत तरीके से निरंतर योजनाओं के निर्माण और उन्हें लागू करने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा) की ओर से देश में सभी तक न्याय की समान पहुँच सुनिश्चित करने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने समापन भाषण में कहा कि भारत में कानूनी सेवा आंदोलन ने एक मामूली शुरुआत से लेकर एक व्यापक राष्ट्रव्यापी ढाँचे तक एक लंबा सफ़र तय किया है। उन्होंने हालांकि इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रगति का सही मापदंड शुरू की गई पहलों की संख्या में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव की गहराई में निहित है।

न्यायमूर्ति ने निरंतर मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, "प्रगति कभी भी केवल इरादों से नहीं मापी जाती। जिन लोगों की हम सेवा करते हैं उनके जीवन में वास्तविक बदलावों का आकलन करने की हमारी क्षमता से मापी जाती है।" उन्होंने शैक्षणिक और व्यावसायिक संस्थानों के सहयोग के माध्यम से मूल्यांकन संस्कृति को संस्थागत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ऐसा सामाजिक लेखापरीक्षा, अनुसंधान साझेदारी और निरंतर नीति समीक्षा के द्वारा किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने मिशन की निरंतरता और प्रमुख परियोजनाओं के निरंतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए नाल्सा और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के वर्तमान और भावी कार्यकारी अध्यक्षों वाली एक सलाहकार समिति की स्थापना का सुझाव दिया। साथ ही उन्होंने नाल्सा को दीर्घकालिक साझा योजना बनाने का सुक्षाव दिया।

न्यायमूर्ति गवई ने नाल्सा के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने पूर्वोत्तर के सुदूर क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों का दौरा किया था। उन्होंने कहा कि वहाँ कानूनी सहायता शिविरों ने हजारों लोगों को ठोस लाभ पहुँचाया।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानूनी सहायता कार्य के लिए एक सख्त तटस्थ न्यायिक दृष्टिकोण के बजाय 'प्रशासनिक कल्पनाशीलता' और संवेदनशीलता एवं करुणा के साथ जुड़ाव की आवश्यकता होती है। उन्होंने पैरालीगल स्वयंसेवकों, पैनल वकीलों और कानूनी सहायता बचाव पक्ष के वकीलों का सम्मान करने और उन्हें पर्याप्त समर्थन देने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये सभी कानूनी सहायता प्रणाली की 'रीढ़' हैं। उन्होंने सभी अधिकारियों से आग्रह किया कि इन सभी के लिए समय पर और सम्मानजनक पारिश्रमिक उपलब्ध कराया जाना चाहिए, इन्हें निरंतर प्रशिक्षण और भावनात्मक समर्थन उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि उनका मनोबल और प्रतिबद्धता बनी रहे।

न्यायमूर्ति गवई ने कहा, "कानूनी सहायता दान नहीं है। यह एक संवैधानिक वादा है। प्रत्येक स्वयंसेवक, प्रत्येक बचाव पक्ष का वकील, प्रत्येक पैनल वकील उस गरिमा को बहाल कर रहा है जहाँ लंबे समय से इसे नकारा गया है।"मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि कानूनी सहायता आंदोलन न्यायपालिका के मानवीय चेहरे का प्रतिनिधित्व करता है और विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श सुधारों के अगले चरण का मार्गदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा, "जब करुणा प्रतिबद्धता से मिलती है और जब कानून जीवित अनुभव से मिलता है, तो वास्तविक परिवर्तन संभव हो जाता है।"नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष (नामित मुख्य न्यायाधीश) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मुख्य न्यायाधीश के बाद बोलते हुए नालसा की बढ़ती पहुँच पर गर्व व्यक्त किया और कहा कि इसकी सेवाएँ अब भारत के कुछ सबसे दूरस्थ और कमज़ोर समुदायों तक पहुँच गई हैं। उन्होंने कहा, "नाल्सा की छाप उन लोगों के जीवन में दिखाई देती है जो अन्यथा अनदेखे और अनसुने रह जाते।"न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कानूनी सहायता को और बेहतर करने के लिए कहा, "आगे का कार्य नवाचार, प्रौद्योगिकी और सहानुभूतिपूर्ण सहयोग के माध्यम से अपने प्रभाव को गहरा करना है।" उन्होंने पैनल वकीलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वे सार्वजनिक कानूनी ज़रूरतों के लिए स्तंभ हैं और सबसे पहले लोगों तक पहुंचने वाले हैं।

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