देवरिया , सितंबर 23 -- एक जमाने में कांग्रेस के गढ़ के तौर पर विख्यात उत्तर प्रदेश में देवरिया सदर विधानसभा सीट अब भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) का अभेद किला बन चुकी है। भाजपा ने पिछले चार चुनाव में यहां जीत का बिगुल बजाया है।

1952 में पहले आम चुनाव में देवरिया में कांग्रेस का दबदबा था लेकिन यहां सोशलिस्ट आंदोलन भी उतना ही मजबूत था। आचार्य नरेंद्र देव और राम मनोहर लोहिया के विचारों का असर यहां के किसानों पर था। 60 के दशक के अंत में जैसे ही चरण सिंह ने भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) बनाया। देवरिया के कुर्मी, कुशवाहा और यादव वोटर ने कांग्रेस से मुंह मोड़ लिया। 1969 और 1974 में बीकेडी के उम्मीदवारों ने लगातार दो बार जीत दर्ज की। यह वही दौर था जब देवरिया में गन्ना सहकारी समितियों की राजनीति तय करती थी कि विधायक कौन बनेगा।

वर्ष 1977 में जनता पार्टी की लहर में कांग्रेस यहां से साफ हो गई। 1977 से 1989 तक हर चुनाव में चेहरा बदला। जनता पार्टी, फिर जनता दल और फिर कांग्रेस- किसी को भी मतदाता ने दो बार लगातार मौका नहीं दिया।1989 में जनता दल से राम छबीला मिश्र जीते। फिर मंडल-कमंडल की राजनीति आई।

1991 और 1993 की राम लहर में भाजपा के रविन्द्र प्रताप मल्ल ने लगातार दो चुनाव जीते। लेकिन 1996 में जनता दल के सुभाष चंद्र श्रीवास्तव ने उन्हें हरा दिया। इस सीट पर बसपा आज तक कभी नहीं जीती है। 2002 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी से जीते दीनानाथ कुशवाहा 2007 में सपा के टिकट पर फिर जीते।लेकिन तीसरी बार नहीं जीत सके।

2012 में मोदी लहर से पहले ही देवरिया सदर में भाजपा ने वापसी कर ली थी। जन्मेजय सिंह ने 2012 और फिर 2017 में बड़े अंतर से जीत हासिल की। वे जमीनी क्षत्रिय नेता थे। 2020 में उनके आकस्मिक निधन के बाद यह सीट खाली हुई। 2020 का उपचुनाव इस सीट के इतिहास का सबसे अहम चुनाव बन गया। भाजपा ने डॉ. सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी को उतारा और जीते। 2022 के चुनाव में पार्टी ने विधायक सत्य प्रकाश मणि का टिकट काटकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार रहे शलभ मणि त्रिपाठी को मैदान में उतारा और उन्होंने सपा के अजय प्रताप सिंह उर्फ पिन्टू को हराया। इस तरह भाजपा ने इस सीट पर चौथी बार लगातार कब्जा किया।

इस विधानसभा के जातीय गणित को देखा जाता तो यहां पर सवर्ण मतदाताओं (ब्राह्मण-क्षत्रिय) की संख्या अच्छी खाशी है।यहां कुशवाहा-मौर्य, यादव, निषाद और मुस्लिम मतदाता भी निर्णायक हैं। यही वजह है कि भाजपा यहां सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी का समीकरण बनाती है। जबकि सपा यादव, मुस्लिम और कुशवाहा गठजोड़ पर दांव लगाती है। वर्तमान में यहां के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी की पहचान विकास पुरुष की है।लेकिन स्थानीय स्तर पर सड़कों की स्थिति, नगर में जलजमाव जनता के मन को कचोटता है। दूसरी तरफ सपा ने बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया है। वह महंगाई और गन्ना बकाया के मुद्दे पर घेराबंदी कर रही है। 2027 के चुनाव में देवरिया सदर अब सिर्फ विधायक चुनने की सीट नहीं रही। यह तय करती है कि पूर्वांचल में योगी-मोदी के हिंदुत्व और विकास मॉडल पर जनता की मुहर लगती है या फिर सपा की सामाजिक न्याय की राजनीति वापसी करती है।

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