कोलकाता , जुलाई 09 -- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को अंतरिम राहत देते हुए लेन-देन पर रोक लगाये गये पार्टी के तीन बैंक खातों से आवश्यक संगठनात्मक और कानूनी खर्चों के लिए धन का उपयोग करने की अनुमति दे दी है। हालांकि, अदालत ने इन खातों के संचालन को एक विशेष अधिकारी की देखरेख में रखने का निर्देश दिया है।
न्यायाधीश सौगत भट्टाचार्य ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुब्रत तालुकदार को विशेष अधिकारी नियुक्त किया, जो 30 सितंबर तक इन तीनों खातों का प्रबंधन संभालेंगे।
अंतरिम आदेश के तहत, पार्टी का खातों पर सीधा नियंत्रण नहीं होगा और किसी भी तरह की निकासी विशेष अधिकारी के माध्यम से ही की जाएगी। अदालत ने निर्देश दिया कि इन खातों से धनराशि तभी निकाली जा सकती है जब चेक पर तीनों बैंक खातों के किन्हीं दो अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के हस्ताक्षर हों और विशेष अधिकारी द्वारा उसे प्रति-हस्ताक्षरित किया गया हो। यह आदेश पार्टी को अपने दैनिक खर्चों को पूरा करने की अनुमति देता है, लेकिन बिना न्यायिक समीक्षा के किसी भी बड़े या असाधारण खर्च पर रोक लगाता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में चुनाव आयोग तृणमूल के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों में से किसी एक को अंतिम मान्यता दे देता है, तो संबंधित पक्ष इस अंतरिम व्यवस्था में संशोधन के लिए अदालत का रुख कर सकता है। मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को तय की गयी है।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब पुलिस ने 18 जून को पार्टी के विद्रोही गुट के विधायक बिस्वनाथ दास द्वारा दर्ज करायी गयी साइबर धोखाधड़ी की शिकायत के बाद इन खातों से लेन-देन पर रोक लगा दी थी। विधाननगर साइबर थाने में दर्ज शिकायत में आरोप लगाया गया था कि एक बड़े पैमाने पर हुई साइबर धोखाधड़ी की रकम को तृणमूल के कुछ खातों सहित कई बैंक खातों में भेजा गया था।
पार्टी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि खातों को 'फ्रीज' करने से पार्टी का कामकाज ठप हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि एक राजनीतिक दल को अपने अस्तित्व के लिए धन की आवश्यकता होती है और उसके सभी वित्तीय लेन-देन चुनाव आयोग और आयकर विभाग की निगरानी में होते हैं। उन्होंने पुलिस कार्रवाई को बिना किसी पुख्ता सबूत के महज अस्पष्ट आरोपों के आधार पर की गई कार्रवाई बताया।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता बिस्वनाथ दास का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि विद्रोही खेमा ही 'असली' तृणमूल कांग्रेस है और इसलिए पार्टी की संपत्तियों पर उनका वैध दावा है। हालांकि, अदालत ने इस मुद्दे पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि मान्यता का सवाल चुनाव आयोग के समक्ष लंबित है, न कि उच्च न्यायालय के पास।
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