बेंगलुरु , जून 08 -- कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नयी सरकार में मंत्रिमंडल की केवल 20 खाली सीटों के लिए 60 से अधिक विधायकों की दावेदारी से पार्टी आलाकमान के समक्ष बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।
कैबिनेट सीटों के लिए यह खींचतान कांग्रेस सरकार के लिए पहली बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गई है। वरिष्ठता, जातिगत प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन, वफादारी और गुटीय जुड़ाव जैसे आधारों पर किए जा रहे दावों से चयन प्रक्रिया के जटिल होने का खतरा है। पहले चरण में 13 मंत्रियों के शपथ लेने के बाद अब ध्यान बाकी खाली पदों पर केंद्रित हो गया है।
पार्टी सूत्रों की माने तो जबरदस्त लॉबिंग शुरू हो चुकी है और मंत्री पद पाने की होड़ में इच्छुक नेता नयी दिल्ली और बेंगलुरु में वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साध रहे हैं।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार हर उपलब्ध सीट के लिए कम से कम तीन से चार दावेदार हैं। इससे पार्टी की एकता बनाए रखते हुए अलग-अलग हितों को साधने के लिए कांग्रेस आलाकमान पर बढ़ता दबाव साफ दिखता है।
विभागों के बंटवारे और मंत्री पद के प्रतिनिधित्व को लेकर सत्ताधारी पार्टी के भीतर बेचैनी के संकेतों के बीच यह मुद्दा अहम हो गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलिंगा रेड्डी ने हाल ही में बेंगलुरु विकास विभाग न मिलने की वजह से इस्तीफा देने की पेशकश की थी, जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया। श्री जमीर अहमद खान के समर्थकों के भी कैबिनेट से जुड़े मामलों को लेकर विरोध-प्रदर्शन करने की बात सामने आई।
श्री शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले विधायकों को पद मिलने की उम्मीद है, जबकि अन्य पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और संगठन के प्रभावशाली नेताओं के समर्थन पर भरोसा कर रहे हैं। उम्मीद है कि अगली सूची को अंतिम रूप देते समय कांग्रेस नेतृत्व जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों पर भी सावधानी से विचार करेगा। चर्चाओं में लिंगायत, वोक्कालिगा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को प्रमुखता दी जाएगी।
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