बेंगलुरु , जुलाई 15 -- गैर-लाभकारी संगठन जनाग्रह ने बुधवार को कहा कि कर्नाटक सरकार शहरी स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले फंड को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रही है। इसमें कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च और सरकारी नियंत्रण वाली विशेष एजेंसियों को दिए गए फंड को भी स्थानीय सरकारों को स्थानांतरित किए गए फंड में शामिल किया गया है।

असल में शहरी स्थानीय निकायों के लिए दिखाए गए 34,052 करोड़ रुपये में से केवल 4,972 करोड़ रुपये ही चुने हुए नागरिक निकायों तक पहुँचे। 'कर्नाटक के वित्तीय विकेंद्रीकरण के उलटे क्रम की कहानी जारी करते हुए यहाँ अपनी रिपोर्ट में जनाग्रह की वरिष्ठ प्रबंधक मनीषा मारुलसिदप्पा ने कहा कि पाँचवें राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) ने राज्य के विभाज्य राजस्व पूल का 60 प्रतिशत स्थानीय सरकारों को देने की सिफारिश की थी, लेकिन राज्य सरकार ने केवल 50 प्रतिशत ही स्वीकार किया। हालाँकि शहरी हिस्सेदारी को एसएफसी की सिफारिश के अनुसार 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया था, लेकिन संगठन के विश्लेषण से पता चला कि 2026-27 के बजट में कर्नाटक के 327 शहरी स्थानीय निकायों के लिए वास्तविक आवंटन 4,972 करोड़ रुपये था।

रिपोर्ट के अनुसार अन्नभाग्य और गृहलक्ष्मी कल्याणकारी योजनाओं पर 36,308 करोड़ रुपये के खर्च को शहरी स्थानीय निकायों को दिए गए फंड का हिस्सा माना गया, जबकि 8,000 करोड़ रुपये राज्य-नियंत्रित एजेंसियों (शहरी विकास प्राधिकरण और जल आपूर्ति व सीवरेज बोर्ड) को आवंटित किए गए। इस धनराशि को सीधे चुने हुए नागरिक निकायों को स्थानांतरित नहीं किया गया । जनाग्रह ने कहा कि इस तरीके से वित्तीय हस्तांतरण को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, जबकि शहरी स्थानीय सरकारों के पास सीमित वित्तीय स्वायत्तता रह गई है।

सुश्री मारुलसिदप्पा ने कहा कि शहरी स्थानीय निकायों के लिए कर्नाटक का प्रति व्यक्ति राज्य वित्त आयोग अनुदान 2018-19 में 1,791 रुपये से बढ़कर 2026-27 में केवल 2,244 रुपये हुआ है, जबकि तमिलनाडु, ओडिशा और केरल में इसमें 200 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद, पिछले दशक में शहरी स्थानीय निकायों को मिलने वाला आवंटन काफी हद तक स्थिर रहा है। उन्होंने नागरिक बुनियादी ढांचे और रखरखाव के लिए मिलने वाले बिना शर्त अनुदान में भारी कमी का भी ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि ये अनुदान 2011-12 में 990 करोड़ रुपये से घटकर 2026-27 में 75 करोड़ रुपये रह गए हैं, यानी इनमें लगभग 87 प्रतिशत की गिरावट आई है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि मैसूरु का बिना शर्त अनुदान 2014-15 में लगभग 43 करोड़ रुपये से घटकर मौजूदा वित्तीय वर्ष में करीब तीन करोड़ रुपये रह गया है।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव कराने में लगातार देरी से 16वें केंद्रीय वित्त आयोग के तहत अनुदान पाने की कर्नाटक की पात्रता खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि आयोग ने राज्य के शहरी स्थानीय निकायों के लिए अगले पांच वर्षों में लगभग 18,480 करोड़ रुपये की सिफारिश की थी, लेकिन कर्नाटक के 327 शहरी स्थानीय निकायों में से दो-तिहाई से ज़्यादा में अभी कोई चुनी हुई परिषद नहीं है, जो कुछ खास अनुदान पाने के लिए ज़रूरी शर्त है। उन्होंने बताया कि इससे पहले 15वें वित्त आयोग के कार्यकाल के दौरान बेंगलुरु को 964 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था क्योंकि नागरिक चुनाव नहीं कराए गए थे।

जना ग्रह के वरिष्ठ सलाहकार संतोष नरगुंड ने सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कल्याणकारी योजनाओं को स्थानीय सरकारों को दिए जाने वाले अनुदान के तौर पर दिखाने के बजाय राज्य के कल्याणकारी बजट के तहत दिखाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "राज्य सरकार यह पैसा कोई एहसान के तौर पर नहीं दे रही है। यह स्थानीय सरकारों का संवैधानिक अधिकार है। अगर ये संसाधन नहीं दिए जाते हैं, तो स्थानीय शासन के मामले में कर्नाटक में गंभीर नीतिगत संकट पैदा हो जाएगा।"यह पूछे जाने पर कि क्या लेखाकंन का यह तरीका 74वें संवैधानिक संशोधन की भावना को कमज़ोर करता है, श्री नरगुंड ने कहा कि जनाग्रह को तमिलनाडु, ओडिशा और केरल जैसे राज्यों में ऐसी प्रक्रियाएं नहीं मिलीं। उन्होंने कर्नाटक सरकार से लेखांकन के तरीके को स्पष्ट करने और राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट विधानसभा में पेश करने को कहा।

उन्होंने यह भी बताया कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने पहले स्थानीय सरकारों के लिए तय फंड को पैरास्टैटल एजेंसियों को स्थानांतरित करने पर सवाल उठाए थे।

श्री नरगुंड ने कहा कि वित्तीय विकेंद्रीकरण सिर्फ़ केंद्र से राज्यों को फंड स्थानांतरित करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्थानीय सरकारों को पर्याप्त वित्तीय अधिकार देकर इसे शहरों, कस्बों और गांवों तक भी बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गवर्नेंस और नागरिक सेवाओं की डिलीवरी को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक रूप से सशक्त स्थानीय निकाय ज़रूरी हैं।

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