बेंगलुरु , अप्रैल 11 -- कर्नाटक में 9 अप्रैल को हुए दावणगेरे दक्षिण विधानसभा उपचुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी में बड़ा विवाद सामने आया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं पर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के उम्मीदवार को समर्थन देने और अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ काम करने का आरोप लगा है।
इस विवाद के केंद्र में कुछ बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उपचुनाव के दौरान एसडीपीआई के एक उम्मीदवार को आर्थिक और रणनीतिक मदद दी। इन आरोपों ने पार्टी की राज्य इकाई के भीतर एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है।
पार्टी के अंदरूनी हलकों में चल रहे आरोपों के मुताबिक राज्य मंत्री जमीर अहमद खान पर विधान पार्षद नजीर अहमद और जब्बार के साथ मिलकर एसडीपीआई उम्मीदवार अफजल कोडलीपटे को धन मुहैया कराने और उनका समर्थन करने का आरोप है। इसमें यह दावा भी शामिल है कि चुनाव प्रचार से जुड़ी गतिविधियों के लिए लगभग 10 करोड़ रुपये की रकम पहुंचाई गई। इन दावों की हालांकि स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है।
इस मामले ने राजनीतिक माहौल को और भी अधिक गरमा दिया है। ऐसी चर्चा है कि यह मामला कांग्रेस के आलाकमान तक पहुंच चुका है और संकेत मिल रहे हैं कि जिन नेताओं के नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। पार्टी ने हालांकि अब तक इस मामले पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है, जिससे पार्टी के भीतर अटकलें और बेचैनी और भी बढ़ गई है।
यह विवाद कर्नाटक में कांग्रेस के लिए एक ऐसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय पर सामने आया है, जब मुख्यमंत्री सिद्दामैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व को लेकर तनाव अभी भी चल रहा है।
गौरतलब है कि दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव मौजूदा विधायक शमनूर शिवरंगप्पा के निधन के कारण हुआ था, जिसमें 9 अप्रैल को मतदान हुआ था और नतीजे 4 मई को आने हैं। लेकिन चुनाव के बाद की चर्चाओं में अब चुनावी आंकड़ों की बजाय पार्टी के भीतर चल रही आपसी खींचतान और आरोपों का ही बोलबाला है।
इस विवाद की जड़ें उम्मीदवार के चयन को लेकर उपजे असंतोष में भी हैं। नेताओं का एक धड़ा अल्पसंख्यक समुदाय से किसी उम्मीदवार को टिकट देने की वकालत कर रहा था लेकिन पार्टी ने आखिरकार मंत्री एसएस मल्लिकार्जुन के बेटे समर्थ मल्लिकार्जुन को ही मैदान में उतारा।
कांग्रेस जैसे-जैसे इस विवाद से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, यह घटना सत्ताधारी पार्टी के लिए शर्मिंदगी का एक नया मोर्चा खोल दिया है। यह ऐसा मोर्चा है जिसमें चुनावी रणनीति से जुड़े विवाद और गुप्त राजनीतिक गठजोड़ के आरोप आपस में घुल-मिल गए हैं और अब यह खतरा मंडरा रहा है कि ये विवाद कहीं उपचुनाव के नतीजों पर ही भारी न पड़ जाएं।
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