बेंगलुरु , मार्च 20 -- कर्नाटक में नौ अप्रैल को होने वाले दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट उपचुनावों से पहले कांग्रेस परिवारों के दावों से उपजे कलह और जातिगत समीकरणों के दबाव से जूझ रही है।
उम्मीदवारों के चयन की एक सामान्य प्रक्रिया के बदले पार्टी में नाजुक और कभी-कभी असहज स्थिति बनी हुई है।
बागलकोट में वरिष्ठ नेता एच वाई मेती के निधन से उत्तराधिकार को लेकर एक अनुमानित लेकिन जटिल बहस छिड़ गई है। उनके बेटे मल्लिकार्जुन मेती और उमेश मेती प्रमुख दावेदारों में शामिल हैं साथ ही परिवार के अन्य सदस्य भी अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। कांग्रेस के सामने अब भावनात्मक पहलुओं एवं रणनीति के बीच संतुलन स्थापित करने और विरासत एवं चुनावी संभावनाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती है।
दावणगेरे दक्षिण एक ज्यादा जटिल चुनौती पेश कर रहा है। दिग्गज नेता शमनूर शिवशंकरप्पा का परिवार अपनी मजबूत राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अपना दावा पेश कर रहा है। वहीं दूसरी ओर, पार्टी में एक शांत लेकिन दृढ़ गुट का तर्क है कि निर्वाचन क्षेत्र की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए एक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देना आवश्यक है।
इस प्रकार पार्टी के सामने एक ऐसी वास्तविकता है जिससे निपटने का प्रयास वह लंबे समय से करती आ रही है जिसमें जाति, समुदाय और निरंतरता का जटिल अंतर्संबंध शामिल हैं। लिंगायत समुदाय का प्रभाव अभी भी महत्वपूर्ण है लेकिन अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों का कांग्रेस का अहिंदा आधार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन सभी पहलुओं में सामंजस्य स्थापित करना अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल सिद्ध हो रहा है।
उपचुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 23 मार्च निर्धारित है इसलिए समय भी कम है। एआईसीसी प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की बैठक में इस मामले के सुलझने की उम्मीद है हालांकि ऐसे समझौते शायद ही कभी सभी पक्षों को संतुष्ट कर पाते हैं।
दूसरी ओर भाजपा इस स्थिति पर दिलचस्पी से नजर बनाए हुई है तथा उसे केवल अपनी स्थिति मजबूत करने की आवश्यकता है जबकि उसका प्रतिद्वंद्वी अपने आंतरिक विरोधाभासों से जूझ रहा है।
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