बेंगलुरु , जुलाई 17 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को 'ग्रेटर बेंगलुरु गवर्नेंस' (जीबीजी) अधिनियम, 2024 को संवैधानिक चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की।

मुख्य न्यायाधीश विभू बाखरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा की पीठ के सामने याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि यह कानून नगर निकायों को पूरी तरह शक्तिहीन बना देता है और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की संवैधानिक व्यवस्था को खत्म करता है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा, "यह अधिनियम 74वें संविधान संशोधन की पूरी अवधारणा की धज्जियां उड़ा रहा है।" उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के संवैधानिक उद्देश्य को विफल करता है।

याचिकाकर्ताओं ने आगे दलील दी कि जीबीजी अधिनियम निर्वाचित प्रतिनिधियों से शासन की प्रमुख शक्तियां वापस लेकर 'स्थानीय निकायों को शक्तिहीन बना देता है', जिससे संविधान के तहत नगर पालिकाओं को दी गयी स्वायत्तता कमजोर होती है।

अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि जमीनी स्तर के लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय, यह कानून सत्ता का केंद्रीकरण करता है और उन शक्तियों को नष्ट करता है, जिन्हें 74वां संविधान संशोधन निर्वाचित नगर निकायों में निहित करना चाहता था। यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीबीजी अधिनियम बेंगलुरु के नागरिक प्रशासन के पुनर्गठन के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

दलीलों को सुनने के बाद, उच्च न्यायालय ने मामले में कार्यवाही जारी रखी। इस दौरान कोई अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया और याचिकाएं फिलहाल लंबित हैं।

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