नयी दिल्ली , मई 26 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के नवंबर 2025 के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि कानून (लॉ) के छात्रों को केवल उपस्थिति कम होने के आधार पर परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जा सकता।
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय के इस फैसले के कारण नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (एनएलयू) को नुकसान उठाना पड़ रहा था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने वर्ष 2025 के इस फैसले को चुनौती देने वाली बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की याचिका पर उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाते हुए कहा, "सभी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज परेशान हैं। कोई भी छात्र अनिवार्य उपस्थिति नहीं चाहता। यहां तक कि जो छात्र पास आउट हो चुके हैं, वे भी छात्रों का समर्थन कर रहे हैं।"पीठ ने आदेश दिया, "नोटिस जारी किए जाएं, जिनका जवाब 21 जुलाई तक देना होगा। इस बीच विवादित फैसले के पैराग्राफ 249 का प्रभाव और क्रियान्वयन स्थगित रहेगा। यह रोक भविष्य के मामलों पर ही लागू होगी।"शीर्ष न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख करने में हुई देरी को लेकर बीसीआई से सवाल किया। पीठ ने बीसीआई अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा से पूछा, "आप इतनी देर से क्यों आये?"गौरतलब है कि बीसीआई भारत में कानूनी पेशे और कानूनी शिक्षा को विनियमित करने वाला सर्वोच्च वैधानिक निकाय है।
श्री मिश्रा ने स्वीकार किया कि यह देरी उनकी लापरवाही थी।
एक संबंधित मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय का यह फैसला वास्तव में उन छात्रों के बीच अनुशासनहीनता को बढ़ावा दे रहा था, जो कक्षाओं में शामिल नहीं हो रहे थे। इसके जवाब में पीठ ने टिप्पणी की कि यह फैसला इस मुद्दे पर कानून बनाने जैसा प्रतीत होता है और सवाल उठाया कि क्या यह छात्रों को महाविद्यालय न जाने का अधिकार देता है?शीर्ष न्यायालय के समक्ष यह चुनौती दिल्ली उच्च न्यायालय के नवंबर 2025 के फैसले पर हमला करने वाली कई याचिकाओं से उपजी है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नामांकित छात्रों को केवल अपर्याप्त उपस्थिति के कारण परीक्षाओं से रोका नहीं जा सकता और न ही उनकी शैक्षणिक प्रगति बाधित की जा सकती है।
उच्च न्यायालय ने एमिटी यूनिवर्सिटी के कानून के छात्र सुशांत रोहिला की 2017 में आत्महत्या के बाद शुरू की गयी स्वत: संज्ञान जनहित याचिका का निपटारा करते हुए ये निर्देश जारी किये थे। आरोप था कि कम उपस्थिति को लेकर रोहिला को प्रताड़ित किया गया था और उन्हें बीए एलएलबी कार्यक्रम में एक शैक्षणिक वर्ष दोहराने के लिए मजबूर किया गया था। कथित तौर पर इन परिस्थितियों ने ही उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाया था।
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