जौनपुर , मार्च 02 -- उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में कभी पलाश (ढाक) के फूलों से गुलजार रहने वाला जंगल आज वीरान होता जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कृत्रिम रंगों के बढ़ते प्रयोग ने बीते चार-पांच दशकों में पारंपरिक प्राकृतिक रंगों की परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया। अब जब जैविक खेती और प्राकृतिक रंगों की ओर रुझान बढ़ रहा है, तब पुरानी व्यवस्था की प्रासंगिकता फिर चर्चा में है।

होली के त्योहार के करीब आते ही प्राकृतिक रंगों की मांग बढ़ती है। चुकंदर, गुड़हल, गेंदे के फूल और अनार के छिलकों से भी रंग बनाए जाते हैं, लेकिन परंपरागत रूप से पलाश के फूलों से तैयार रंग सबसे लोकप्रिय माना जाता रहा है।

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार विकास खंड मछलीशहर की ग्राम पंचायत तिलौरा एवं बामी के बीच कई वर्ग किलोमीटर में फैला जंगल 1990 के दशक तक पलाश के फूलों का प्रमुख स्रोत था। रामगढ़, करौरा, सेमरहो, अदारी, महापुर, जमुहर और खरुआंवा समेत आसपास के दर्जनों गांवों के लोग होली के लिए यहीं से फूल तोड़कर ले जाते थे।

समय के साथ जंगल का दायरा सिमटता गया और लोगों ने रासायनिक रंगों की ओर रुख कर लिया। वर्तमान स्थिति यह है कि पूरे क्षेत्र में केवल 15 से 20 पेड़ ही बचे हैं और उनमें भी अभी पूरी तरह फूल नहीं आए हैं। सेमरहो निवासी अमृत लाल, जो पौधशाला में कार्यरत हैं, पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि होली से पहले जंगल में पलाश के फूल तोड़ने की होड़ लग जाती थी। पलाश की छाल का उपयोग औषधीय प्रयोजनों में भी किया जाता था।

अब जब लोग फिर से प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं, तो बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पलाश के इस जंगल के दिन फिर बहुरेंगे। क्या इनके संरक्षण और पुनरोपण के प्रयास तेज होंगे। यह समय ही बताएगा।

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