दरभंगा , जुलाई 10 -- िहार के प्रतिष्ठित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (एलएनएमयू) के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं उर्दू विभाग की ओर से नागार्जुन चेयर के तत्वावधान में शुक्रवार को 'हमारा समय : कबीर और नागार्जुन की विरासत' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन राजनीति विज्ञान विभाग के सभागार में किया गया।इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि कबीर और नागार्जुन की वैचारिक विरासत आज भी समाज को नई दिशा देने में प्रासंगिक है।
संगोष्ठी का उद्घाटन दीप प्रज्वलन, स्वागत गीत और अतिथियों के सम्मान के साथ हुआ। पहले सत्र का संचालन डॉ. मंजरी खरे तथा अध्यक्षता मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने की। दूसरे सत्र का संचालन डॉ. बिन्दु चौहान एवं अध्यक्षता प्रो. राजेन्द्र साह ने की, जबकि तीसरे सत्र का संचालन डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन तथा अध्यक्षता प्रो. इफ्तिखार अहमद ने की।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के हिन्द विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि कबीर और नागार्जुन भारतीय सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परंपरा के ऐसे महान रचनाकार हैं, जिन्होंने साहित्य को समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया और आज भी नई सामाजिक चेतना के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि कबीर और नागार्जुन हमारे सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गौरव हैं। दोनों महापुरुषों ने साहित्य और समाज को महत्त्वपूर्ण दिशा दी है। वे आज भी नवीन समाज रचना के लिए निश्चित ही पथ- प्रदर्शक हैं।
बीज वक्तव्य में प्रो. विजय कुमार ने कहा कि मध्यकालीन संक्रमण के दौर में कबीर ने भारतीय समाज को नई दिशा दी, वहीं स्वातंत्र्योत्तर भारत की सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों के विरुद्ध नागार्जुन ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनचेतना को स्वर दिया।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने कहा कि कबीर और नागार्जुन के जीवन-दर्शन में समाज के लिए समर्पण और लोकमंगल की भावना समान रूप से दिखाई देती है। दोनों साहित्यकारों ने अपने साहित्य को जनजीवन से जोड़कर उसे जीवनोपयोगी बनाया। कबीर और नागार्जुन को यह बात भी जोड़ती है कि दोनों ही जीवन पर्यन्त समाज के लिए समर्पित रहे। अपने साहित्य को इन्होंने सायास जीवनोपयोगी बनाया।
पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. प्रभाकर पाठक ने कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद कबीर और नागार्जुन अपने विचारों से कभी विचलित नहीं हुए। वैचारिक स्तर पर दोनों की निकटता उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है।
पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. अजीत वर्मा ने नागार्जुन पर केंद्रित अपनी स्वरचित कविता का पाठ करते हुए कहा कि कबीर और नागार्जुन भारतीय समाज की चेतना में सदैव जीवित रहेंगे।
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि नागार्जुन, कबीर की वैचारिकी की अगली कड़ी हैं। वर्तमान समय में धर्म के दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच दोनों कवियों के विचार समाज को सही दिशा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के अनुग्रह नारायण कॉलेज के सहायक प्राध्यापक एवं कबीर के शोधकर्ता डॉ. कुमार वरुण ने कहा कि कबीर मूलतः अभेद के कवि हैं और कबीर तथा नागार्जुन दोनों के जीवन एवं साहित्य में कथनी और करनी का पूर्ण सामंजस्य दिखाई देता है।
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राजेन्द्र साह ने कहा कि कबीर के प्रतीक, बिंब और मिथक लोकजीवन से जुड़े हैं तथा सामाजिक प्रतिबद्धता को मूल्य के रूप में स्थापित करने में जिस भूमिका का निर्वहन कबीर ने किया, आधुनिक काल में वही भूमिका नागार्जुन ने निभाई। दोनों कवियों ने साहित्य को जनोन्मुख और लोकतांत्रिक स्वर प्रदान किया।
संगोष्ठी में डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन, डॉ. महेश प्रसाद सिन्हा, डॉ. विनीता कुमारी, डॉ. ज्वालचंद्र चौधरी, डॉ. धर्मेन्द्र दास, डॉ. रश्मि सहित अनेक शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
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