(जयंत रॉय चौधरी आरती बाली से)नयी दिल्ली , जनवरी 12 -- सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज योंग-बून यिओ ने कहा है कि दक्षिण एशिया में भारत की सबसे अच्छी दीर्घकालिक रणनीति संयम, क्षेत्रीय तालमेल और बाहरी शक्तियों को आंतरिक मतभेदों का फायदा उठाने से रोकना है।
श्री यिओ ने यूनीवार्ता को दिये साक्षात्कार में कहा कि दक्षिण एशिया की राजनीतिक सीमाएं अक्सर कहीं अधिक पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक निरंतरताओं को छिपा देती हैं। दो साल पहले की अपनी बंगलादेश यात्रा को याद करते हुए उन्होंने इस बात पर गौर किया कि कैसे पश्चिम बंगाल और बंगलादेश के लोग बंगाली भाषा में सहजता से संवाद करते हैं। उन्होंने इसे विभाजन के बाद की कई सीमाओं के 'कृत्रिम स्वरूप' के रूप में वर्णित किया।
श्री यिओ ने कहा, "बंगाल और बंगलादेश का विभाजन 'कृत्रिम' है जैसे दो पंजाबों के बीच का है।" उन्होंने यह भी कहा, "इन सीमाओं ने साझा इतिहास या भावनात्मक रिश्तों को खत्म नहीं किया है।" उन्होंने हालांकि यह स्वीकार किया कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जमे अविश्वास के बोझ का कोई आसान समाधान नहीं है।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की तरफ से आयोजित प्रतिष्ठित सी डी देशमुख व्याख्यान देने के लिए भारत आये श्री यिओ के अनुसार, ये अनसुलझे आंतरिक तनाव इस क्षेत्र को बाहरी दखलअंदाजी के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी ताकतें दक्षिण एशिया की फूट का फायदा उठाकर और दरारों को गहरा सकती हैं। उन्होंने कहा, "इसीलिए भारत के लिए यह सबसे अच्छा होगा कि वह तनाव कम रखे और अपने पड़ोस में 'वेस्टफेलियन सिस्टम' को काम करने दिया जाये।" उन्होंने आगे कहा कि इस क्षेत्र में अस्थिरता आखिरकार भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करती है।
वेस्टफेलियन सिस्टम का उल्लेख 17वीं शताब्दी की संधि से है, जो संप्रभु राज्यों की एक आधुनिक प्रणाली की स्थापना के लिए यूरोपीय शक्तियों के बीच हुई थी। यह संप्रभुता, पारस्परिक मान्यता और परस्पर निर्भरता पर आधारित थी, जिसने सदियों की संघर्ष को समाप्त कर दिया था।
उन्होंने देखा कि पिछले दो दशकों में चीन का दृष्टिकोण भारत-पाकिस्तान संबंधों को नियंत्रण से बाहर होने से रोकने का रहा है। "जब भी चीनी नेता पाकिस्तान गये, उन्होंने भारत का भी दौरा किया। बीजिंग ने आम तौर पर संतुलन साधने की कोशिश की।" श्री यिओ ने साथ में यह भी इंगित किया कि हाल के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद चीन सार्वजनिक रूप से शांत रहा है।
उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया में इस्लामी कट्टरपंथ के मुद्दे पर श्री येओ ने कहा कि इस क्षेत्र ने बड़ा उफान देखा है, साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि संभवतः यह अपने चरम पर पहुंच चुका है।
उन्होंने तर्क दिया कि चरमपंथी आंदोलन पूरी तरह से स्वाभाविक नहीं थे। पिछले भू-राजनीतिक दौर में अमेरिकी रणनीतिक उद्देश्यों, पाकिस्तानी मदद और सऊदी फंडिंग के मेल से 'जानबूझकर बढ़ावा दिया गया' था।
उन्होंने कहा, "हम आईएसआईएस और अल-कायदा के उदय में बड़ी ताकतों के निशान देखते हैं, लेकिन स्थिति अब बदल गयी है।"श्री यिओ ने मध्य पूर्व में आये बदलाव की ओर ध्यान दिलाया। इसमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अब चरमपंथ को अपनी स्थिरता के लिए सीधा खतरा मानते हैं।
अफगानिस्तान के संदर्भ में उन्होंने कहा कि तालिबान की वापसी ने विरोधाभासी रूप से एक प्रकार की उदारता या नरमी पैदा की है, जो विचारधारा के बजाय जरूरत आधारित है। उन्होंने आगे कहा कि कट्टरपंथ को कम होने में समय लगेगा, लेकिन इसका उफान अब गुजर चुका है।
खास तौर पर बंगलादेश की बात करें तो श्री येओ ने कट्टरपंथ के बारे में डराने वाली धारणाओं के प्रति आगाह किया।
उन्होंने कहा, "बंगालियों की एक लंबी बौद्धिक और दार्शनिक परंपरा रही है। वे ऐसे लोग नहीं हैं, जिनका झुकाव उग्रवाद या अतिवाद की ओर हो।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बंगलादेश की आर्थिक सफलता काफी हद तक कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पर टिकी है, जो लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता की संभावना को कम करती है। उन्होंने आगे कहा, "ऐसी कल्पना करना कठिन है कि महिलाएं उन ताकतों का समर्थन करेंगी, जो आर्थिक प्रगति के लिए खतरा पैदा करती हैं।"ईरान में वर्तमान शासन के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर श्री यिओ ने जोर दिया कि इस देश को सभ्यतागत नजरिये से देखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ईरान एक प्राचीन कौम है, जिसका इस्लाम बहुत ही बौद्धिक है।
राजनीतिक जड़ता और आर्थिक कुप्रबंधन को लेकर व्यापक हताशा को स्वीकार करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि ईरान की अशांति को निरंतर बाहरी दबाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
श्री यिओ ने कहा कि सोशल मीडिया और विभिन्न एजेंसियों के जरिये अमेरिका और इजरायल की भागीदारी रहती है, जो आंतरिक असंतोष को और अधिक हवा देती है। उन्होंने गौर किया कि निर्वासित पूर्व ईरानी शाह के बेटे की मौजूदगी एक स्पष्ट राजनीतिक रोडमैप के बजाय केवल विकल्पों की प्रतीकात्मक तलाश को दर्शाती है।
यह पूछने पर कि क्या वर्तमान अशांति इस्लामी गणतंत्र की सत्ता को उखाड़ सकती है तो श्री यिओ ने सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा, "ईरान अपनी पहचान को लेकर बहुत सजग है और अगर सत्ता परिवर्तन होता भी है तो वहां के सामाजिक संतुलन को बिगाड़ना आसान नहीं होगा।" साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बदलाव का दौर हमेशा जोखिम भरा होता है।
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