भुवनेश्वर , अक्टूबर 14 -- जिस कटहल के छिलकों को हम कचरे में फेंक देते हैं, वे छिलके अब दूषित पानी को साफ करने के काम आ सकते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के बेकार फेंके गए छिलकों से एक पेटेंट जल शोधन पदार्थ विकसित किया है। यह दूषित पानी से 20 मिनट के भीतर 90 प्रतिशत से अधिक और अधिकतम 97 प्रतिशततक फ्लोराइड हटाने में सफल रहा है।

एनआईटी के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलकों से एक्टिवेटेड कार्बन तैयार किया और उसकी फ्लोराइड पकड़ने की क्षमता को बढ़ाने के लिए उसे जिरकोनियम से संशोधित किया। पीने के पानी में अत्यधिक फ्लोराइड की उपस्थिति दांतों और हड्डियों को नुकसान पहुंचाने वाले 'डेंटल और स्केलेटल फ्लोरोसिस' का कारण बनती है। रिवर्स ऑस्मोसिस और आयन एक्सचेंज जैसी मौजूदा पद्धतियों की सीमाओं तथा भारी मात्रा में पानी की बर्बादी को देखते हुए यह एक टिकाऊ विकल्प साबित हो सकता है। यह शोध रासायनिक इंजीनियरिंग विभाग की प्रो सुष्मिता मिश्रा और शोध स्नातक डॉ प्रतिमा मिंज ने किया है, जिसके लिए टीम को पेटेंट भी मिल चुका है। इसने एक से पांच मिलीग्राम प्रति लीटर की फ्लोराइड सांद्रता वाले पानी पर किए गए परीक्षणों में इस तकनीक ने असाधारण दक्षता दिखाई है। वर्तमान में यह तकनीक टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 4 पर है, जिसका अर्थ है कि प्रयोगशाला वातावरण में इसका सफल सत्यापन हो चुका है।

तैयारी में इस्तेमाल हुई बिजली और रसायनों के आधार पर इसके संश्लेषण की लागत लगभग 37 रुपये प्रति ग्राम आंकी गई है।

कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन में बदलने वाला यह पदार्थ ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में घरेलू एवं सामुदायिक स्तर पर पानी के उपचार के लिए एक बेहतर आशा लेकर आ सकता है। शोधकर्ताओं का हालांकि कहना है कि इसे व्यापक उपयोग में लाने से पहले एक भौतिक प्रोटोटाइप विकसित कर इसके दीर्घकालिक प्रदर्शन और व्यावहारिक उपयुक्तता का मूल्यांकन किया जाएगा।

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