कानपुर नगर , जून 23 -- उच्चतम न्यायालय के निर्देशों तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के प्रभावी क्रियान्वयन की तैयारी के तहत कानपुर में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विषयक एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें स्रोत स्तर पर कचरे के पृथक्करण और बल्क वेस्ट जेनरेटरों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में आयोजित कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण और नियमों का शत-प्रतिशत अनुपालन आवश्यक है। उन्होंने नगर निगम सहित संबंधित विभागों, संस्थानों तथा बल्क वेस्ट जेनरेटरों को निर्धारित दायित्वों का प्रभावी निर्वहन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि अब कचरा प्रबंधन केवल नगर निकायों की जिम्मेदारी नहीं रहेगा। बड़े संस्थानों, होटल, अस्पतालों, औद्योगिक इकाइयों और बड़े आवासीय परिसरों को भी अपने यहां उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की जिम्मेदारी निभानी होगी।
जिलाधिकारी ने नगर निगम को निर्देश दिया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वर्तमान कूड़ा संग्रहण एवं निस्तारण व्यवस्था का विस्तृत परीक्षण कर कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने गीले, सूखे, स्वच्छता संबंधी और घरेलू खतरनाक अपशिष्ट के पृथक संग्रहण हेतु आवश्यक संसाधन, वाहन और डस्टबिन उपलब्ध कराते हुए चरणबद्ध ढंग से नई व्यवस्था लागू करने पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन की शुरुआत घरों, संस्थानों और प्रतिष्ठानों में कचरे के पृथक्करण से होती है। यदि कचरे को स्रोत स्तर पर अलग-अलग नहीं किया जाएगा तो उसका प्रभावी निस्तारण और पुनर्चक्रण संभव नहीं होगा। कार्यशाला में बताया गया कि अब कचरे को चार श्रेणियों में अलग करना अनिवार्य होगा। हरे डस्टबिन में गीला कचरा, नीले डस्टबिन में पुनर्चक्रण योग्य सूखा कचरा, लाल डस्टबिन में स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट तथा काले डस्टबिन में घरेलू खतरनाक अपशिष्ट रखा जाएगा।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत कुमार सुमन ने बताया कि 20 हजार वर्गमीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले परिसर, प्रतिदिन 40 केएलडी या उससे अधिक जल उपभोग करने वाले संस्थान अथवा प्रतिदिन 100 किलोग्राम या उससे अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करने वाले प्रतिष्ठान 'बल्क वेस्ट जेनरेटर' की श्रेणी में आएंगे।
उन्होंने कहा कि ऐसे सभी संस्थानों के लिए निर्धारित पोर्टल पर पंजीकरण कराना तथा प्रत्येक वर्ष 30 जून तक वार्षिक विवरणी प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। गीले कचरे का निस्तारण परिसर में ही कम्पोस्टिंग अथवा बायोमीथनेशन के माध्यम से करना होगा, जबकि सूखे एवं स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट का निस्तारण अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से किया जाएगा। नियमों के उल्लंघन पर पर्यावरणीय प्रतिकर लगाए जाने का भी प्रावधान है।
कार्यशाला में ऑनलाइन ट्रैकिंग एवं मॉनिटरिंग प्रणाली, रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ), संसाधन पुनर्प्राप्ति, पर्यावरणीय प्रतिकर तथा सतत अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े विभिन्न प्रावधानों की जानकारी भी दी गई। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत कुमार सुमन, जल निगम (ग्रामीण) के वैभव श्रीवास्तव, नगर निगम के जोनल अधिकारी, इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रतिनिधि, विभिन्न औद्योगिक प्रतिष्ठानों, होटलों तथा संबंधित विभागों के अधिकारी एवं प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
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