भुवनेश्वर , अक्टूबर 03 -- वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्लूआईआई) की एक बेहद खास और तीन साल चली खोजबीन ने ओडिशा तट के साथ ऑलिव रिडले कछुओं के आवागमन के तरीके, उनके आवास, प्रवास के रास्तों और घोंसले बनाने के व्यवहार पर नया प्रकाश डाला है, जिससे उनके संरक्षण के लिए नयी वैज्ञानिक जानकारियां मिली हैं।

देहरादून स्थित डब्लूआईआई के ओडिशा वन्यजीव संगठन, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड और अडानी फाउंडेशन के सहयोग से शुरू की गई इस शोध पहल के पहले वर्ष में हासिल हुयी जानकारियां शनिवार को यहां जारी की गईं।

अध्ययन के दौरान सैटेलाइट टेलीमेट्री तकनीक के जरिए 10 ऑलिव रिडले कछुओं को कुल 1,748 दिनों की अवधि तक ट्रैक किया गया, जिससे नर और मादा कछुओं के बीच आवाजाही के अलग-अलग तरीके का पता चला। इसमें एक मादा कछुए ने 271 दिनों में 6,719 किलोमीटर की यात्रा की और श्रीलंका के पूर्वी इलाके तक पहुंची। इससे पता चलता है कि यह प्रजाति खासी दूरी तय करती है। यह अध्ययन कछुओं के तटीय इलाके और घोंसले के आवासों के उपयोग को समझने के लिए सैटेलाइट टेलीमेट्री, नाव-आधारित सर्वेक्षणों और तटरेखा विश्लेषण को जोड़ता है।

प्रथम वर्ष की रिपोर्ट जारी करते हुए ओडिशा के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री गणेश राम सिंह खूंटिया ने कहा कि ये निष्कर्ष साक्ष्य-आधारित संरक्षण योजना के लिए एक मजबूत वैज्ञानिक आधार प्रदान करेंगे।

इस अध्ययन में नाव-आधारित सर्वेक्षणों में 1,390 एकल कछुओं और 67 जोड़े कछुओं को दर्ज किया गया, जिनमें से अधिकांश चीजें तटरेखा के दो किलोमीटर के भीतर दर्ज की गईं। अडानी फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. प्रीति जी. अडानी ने कहा कि ऑलिव रिडले कछुए ओडिशा की प्राकृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके संरक्षण के लिए इस प्रजाति की आवाजाही और जीवन चक्र की गहरी समझ आवश्यक है।

उल्लेखनीय है कि केंद्रपाड़ा जिले के गहीरमाथा और गंजम जिले के रुशिकुल्या में ऑलिव रिडले संकटग्रस्त समुद्री कछुए यहां बड़े पैमाने पर आते हैँ। ऑलिव रिडले कछुए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं।

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