भुवनेश्वर , अक्टूबर 14 -- ओडिशा की पहली महिला इलेक्ट्रिक बस ड्राइवर शुभलक्ष्मी ने वास्तव में जेंडर से जुड़ी रूढ़ियों को तोड़कर एक नयी मिसाल कायम की है।
राज्य की पहली महिला इलेक्ट्रिक बस ड्राइवर के तौर पर वह हर सुबह क्योंझर के 'आमा बस डिपो' में बस की कमान संभालती हैं। वह जेंडर से जुड़ी पुरानी रूढ़ियों को चुनौती देती हैं और दिखाती हैं कि महिलाओं के लिए भी संभावनाओं के नये द्वार खुल सकते हैं।
राजधानी क्षेत्र शहरी परिवहन (सीआरयूटी) के साथ इलेक्ट्रिक बस ड्राइवर के तौर पर सुश्री शुभलक्ष्मी ने एक ऐसे पेशे में कदम रखा है जिसमें पारंपरिक रूप से पुरुषों का दबदबा रहा है। उन्होंने साबित कर दिया है कि यात्री बस चलाना सिर्फ़ पुरुषों का काम नहीं है। उनका सफ़र दिखाता है कि जैसे-जैसे भारत अधिक स्थायित्व और समावेशी परिवहन प्रणाली की ओर बढ़ रहा है, महिलाओं के लिए गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में करियर बनाने के मौके बढ़ रहे हैं।
यात्री बस चलाने के लिए तकनीकी कौशल, सतर्कता, अनुशासन और यात्रियों की सुरक्षा के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना की ज़रूरत होती है। इलेक्ट्रिक बस चलाने के लिए उसकी खास प्रणाली और परिचालन ज़रूरतों की जानकारी होना भी ज़रूरी है। सुश्री शुभलक्ष्मी ने प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव के ज़रिए ऐसे क्षेत्र में ये ज़िम्मेदारियां संभाली हैं जहां महिलाओं की भागीदारी कम रही है।
उनकी उपलब्धि ओडिशा में इस पेशे में आने वाली पहली महिला होने से कहीं अधिक है। यह जेंडर और काम को लेकर पारंपरिक सोच को चुनौती देती है और उन दूसरी महिलाओं के लिए भी संभावनाएं बढ़ाती है जो उन क्षेत्रों में काम करना चाहती हैं जिन्हें पारंपरिक रूप से पुरुषों का क्षेत्र माना जाता है। उनकी कहानी समावेशी विकास के एक अहम पहलू को भी उजागर करती है। उभरते हुए क्षेत्रों में मौके सभी के लिए उपलब्ध होने चाहिए, चाहे जेंडर कोई भी हो।
सुश्री शुभलक्ष्मी का सफ़र ऐसे समय में सामने आया है जब शहरी गतिशीलता के भविष्य पर चर्चा में स्थायित्व, पहुंच और समावेशिता अहम हो गए हैं। इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक परिवहन अवसंरचना सार्वजनिक परिवहन को बदल रहे हैं लेकिन यह बदलाव अधिक विविधतापूर्ण कार्यबल बनाने का मौका भी देता है।
सुश्री शुभलक्ष्मी का अनुभव इस बात पर ज़ोर देता है कि इस बदलाव का लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे जो इन प्रणालियों को चलाते और बनाए रखते हैं। एक ऐसी युवा महिला के लिए जो पारंपरिक रूप से अपनी पहुंच से बाहर माने जाने वाले करियर के बारे में सोच रही है, किसी दूसरी महिला को यात्री बस चलाते हुए देखना उसकी इच्छा को एक हकीकत में बदलने में मदद कर सकता है। ऐसी मौजूदगी सामाजिक बाधाओं को चुनौती दे सकती है और अधिक महिलाओं को परिवहन और अन्य गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर तलाशने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
केन्दुझार से शुरू हुआ सुश्री शुभलक्ष्मी का सफ़र एक ऐसा संदेश देता है जो बस डिपो या किसी एक ज़िले से कहीं आगे तक जाता है। यह दिखाता है कि कैसे बदलाव रोज़मर्रा के उन कामों से शुरू हो सकता है जो स्थापित नियमों को चुनौती देते हैं और रोज़गार तक पहुंच बढ़ाते हैं।
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