भुवनेश्वर , अक्टूबर 08 -- ओडिशा उच्च न्यायालय ने बिना ठोस आधार वाली शिकायतों के लिए जनहित याचिकाओं के गलत इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी है। न्यायालय ने कहा कि सिर्फ़ आशंका और बिना सबूत वाले दावों पर आधारित याचिकाओं के ज़रिए उसके विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति हरीश टंडन और न्यायमूर्ति चित्तरंजन डैश की खंडपीठ ने कटक ज़िले की तिलाकाना ग्राम पंचायत के अंतर्गत डेमांडो गांव में स्थित सरकारी रेत खदान "लूना नदी रेत सैरात" की नीलामी को जारी रखने के प्रस्ताव को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

खंडपीठ ने कहा कि पीआईएल याचिकाएं बिना ज़रूरी दस्तावेज़ों, पुष्टि करने वाले सबूतों, पर्याप्त शोध या विशेषज्ञों की राय के तेज़ी से दायर की जा रही है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि सिर्फ़ ग्रामीणों के नाम पर न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने से ही कोई याचिका अपने-आप 'जनहित याचिका' नहीं बन जाती।

यह पीआईएल दो लोगों ने दायर की थी जो ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि रेत निकालने से नदी, तटबंध और गांव की सड़क को नुकसान पहुंचा है और स्थानीय निवासियों को परेशानी हुई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ग्रामीणों को रेत खदान की 2020-21 की नीलामी के बारे में जानकारी नहीं थी।

न्यायालय को हालांकि,नदी या तटबंध के कटाव का कोई सबूत नहीं मिला और न ही कोई ऐसे अनुसंधान या विशेषज्ञ की राय मिली जिससे यह साबित हो सके कि रेत निकालने से नदी के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ा, उसके तटबंध को नुकसान पहुंचा या स्थानीय पारिस्थितिकीय प्रणाली पर बुरा असर पड़ा।

यह मानते हुए कि पर्यावरण की सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जनहित के मामले हैं, खंडपीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय केवल आशंका या बिना किसी सबूत के किए गए दावे के आधार पर दखल नहीं दे सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जहां कानूनी व्यवस्था के तहत पर्यावरण और तकनीकी पहलुओं का आकलन करने की ज़िम्मेदारी सक्षम अधिकारियों को सौंपी गई है, वहां उच्च न्यायालय को बिना ठोस सबूत वाले आरोपों के आधार पर ऐसा आकलन नहीं करना चाहिए। न्यायिक दखल तभी उचित होगा जब इस बात के सबूत हों कि तय सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया या अधिकारियों का फ़ैसला गैर-कानूनी था।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित