भुवनेश्वर , जून 02 -- ओडिशा उच्च न्यायालय ने जगतसिंहपुर जिले के रघुनाथपुर ब्लॉक में लघु एवं सीमांत किसानों के लिए शैलो ट्यूबवेल स्थापना हेतु आवंटित 1.50 लाख रुपये के कथित गबन से संबंधित 1990 के दशक के एक सतर्कता (विजिलेंस) मामले में कई सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।
न्यायमूर्ति आदित्य कुमार मोहापात्र ने कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि तीन दशक से अधिक की असाधारण देरी ने मुकदमे की निरंतरता को अन्यायपूर्ण बना दिया है तथा यह संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत आरोपियों को प्राप्त त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय ने कहा, "तीन दशक से अधिक की अत्यधिक देरी उस उद्देश्य को ही विफल कर देती है, जिसकी प्राप्ति के लिए यह कानून बनाया गया था। इससे न केवल आरोपियों के त्वरित सुनवाई के स्थापित अधिकार का हनन होता है, बल्कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया की पवित्रता भी प्रभावित होती है और न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है।"राज्य सतर्कता विभाग ने इस मामले में दो फरवरी, 1993 को प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच पूरी होने में चार वर्ष लग गये और 30 जून, 1997 को आरोप-पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद अपराधों का संज्ञान लेने में भी चार वर्ष और लग गए तथा 30 जून, 2001 को संज्ञान लिया गया। बाद में दो फरवरी, 2007 को मामला विशेष न्यायाधीश (सतर्कता), कटक की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के 31 वर्ष बाद भी, जब 2024 में कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका दायर की गयी तब तक आरोप तय नहीं किये गये थे। न्यायालय के अभिलेखों के अनुसार आरोप-पत्र में नामित 56 व्यक्तियों में से 17 की मामले के लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो चुकी थी।
न्यायमूर्ति मोहापात्र ने कहा कि इतनी लंबी और अस्पष्टीकृत देरी से आरोपियों को गंभीर क्षति पहुंची है। अदालत ने कहा, "अत्यधिक विलंब और कमजोर पड़ चुके साक्ष्य आधार पर चलने वाले किसी भी मुकदमे को निष्पक्ष सुनवाई नहीं कहा जा सकता।" अदालत ने यह भी कहा कि जो आपराधिक कार्यवाही निष्पक्षता सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं है, उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिये।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम को भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से बनाया गया विशेष कानून बताते हुए अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वह पूरी तत्परता से मुकदमे का संचालन करे तथा उसके शीघ्र निस्तारण को सुनिश्चित करे।
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