भुवनेश्वर , अक्टूबर 01 -- ओडिशा में खराब प्रबंधन और कम अवधि में खराब होने वाली दवाओं की खरीद के कारण पिछले करीब छह वर्षों के दौरान 168 करोड़ रुपये मूल्य की दवाइयां एक्सपायर हो गई। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में इस गंभीर प्रशासनिक विफलता का खुलासा हुआ है, जिसमें 47 करोड़ रुपये से अधिक की अप्रयुक्त कोविड-19 की दवाएं भी शामिल हैं।

ओडिशा स्टेट मेडिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अप्रैल 2019 से जनवरी 2025 के बीच की गई दवाओं की खरीद के ऑडिट के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान खरीदी गई 'कसीरीविमैब और इमदेवविमैब' दवाओं की कुल 4,550 शीशियों में से 3,839 शीशियां बिना इस्तेमाल के ही एक्सपायर हो गईं। यह कुल खरीद का 84 प्रतिशत था, जिसकी लागत 42.21 करोड़ रुपये थी। इसी तरह जुलाई 2021 में म्यूकोर्मिकोसिस (ब्लैक फंगस) के इलाज के लिए 5.51 करोड़ रुपये की लागत से खरीदी गई 'एम्फोटेमिसिन-बी-लिपोसामल' की 10,000 शीशियों में से केवल 550 का ही उपयोग हो सका, जबकि 5.21 करोड़ रुपये मूल्य की शेष 9,450 शीशियां बिना इस्तेमाल बेकार हो गईं।

कैग ने पाया कि ऑडिट अवधि के दौरान 700 श्रेणियों की 15.43 करोड़ दवा इकाइयां (कीमत 167.91 करोड़ रुपये) और 94.05 लाख रुपये के सेनेटरी नैपकिन खराब हुए। इनमें 68.90 करोड़ रुपये की दवाएं दान में मिली थीं, जबकि 99.01 करोड़ रुपये की दवाएं राज्य एजेंसी द्वारा खरीदी गई थीं।

सीएजी की एक अन्य रिपोर्ट में ओडिशा के राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग के भूमि उपयोग की निगरानी में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के नियमों का उल्लंघन करते हुए एक अभयारण्य के भीतर की 13.65 एकड़ जमीन को अवैध रूप से 156 प्लाटों में विभाजित करके बेच दिया गया। इसके अलावा, पूरी और खोर्धा जिलों में ईको-सेंसिटिव जोन के अंतर्गत आने वाली 41.65 एकड़ जमीन का उपयोग प्रतिबंधित गतिविधियों के लिए किया गया।

आठ कलेक्ट्रेट और 24 तहसीलों के ऑडिट से पता चला है कि केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना छह तहसीलों में 568.876 एकड़ वन भूमि का गैर-वानिकी गतिविधियों के लिए उपयोग किया गया।

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