मुंबई , सितंबर 13 -- केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को यहां स्थित एशियाटिक सोसाइटी में 'गणेश ज्ञानार्थी' पांडुलिपि प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर उन्होंने संस्था में संरक्षित ज्ञान और सांस्कृतिक संपदा का भारत के विकास और मानवता के हित में व्यापक इस्तेमाल करने पर जोर देते हुए कहा कि ज्ञान को वैचारिक सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए। इसे स्वतंत्र रूप से विकसित होने और समाज में योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस संस्था के पास किताबों, पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखों और ज्ञान के अन्य स्रोतों का समृद्ध संग्रह मौजूद है। यह एक महत्वपूर्ण बौद्धिक संसाधन है, जो 'महान भारत' के निर्माण में योगदान दे सकता है।

उन्होंने कहा कि इस बात पर बहस करने के बजाय कि एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना क्यों, किसने या किस उद्देश्य से की थी, ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि वहां संरक्षित ज्ञान और संग्रह का उपयोग 'महान भारत' के निर्माण के लिए कैसे किया जा सकता है।

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं का जिक्र करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि देश की बौद्धिक विरासत को नष्ट करने के बार-बार प्रयास किये गये हैं, लेकिन वे इसकी ज्ञान प्रणाली को मिटाने में विफल रहे। नालंदा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां के पुस्तकालय को भले ही नष्ट कर दिया गया, लेकिन भारत की मजबूत स्मृति और श्रुति परंपरा के माध्यम से संरक्षित ज्ञान को मिटाया नहीं जा सका।

गृह मंत्री ने कहा कि किसी राष्ट्र की सामूहिक स्मृति को संजोना उसके अस्तित्व और ताकत के लिए बेहद जरूरी है। इतिहास, मूल्य, भाषाएं, अभिलेख और परंपराएं किसी देश की पहचान का अभिन्न अंग होती हैं और इनकी सुरक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने उस औपनिवेशिक दृष्टिकोण की भी आलोचना की, जिसके माध्यम से भारत की बौद्धिक विरासत का अक्सर अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया गया।

उनके अनुसार, भारतीय ज्ञान परंपराओं को भारत के अपने बौद्धिक ढांचे के बजाय औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया, जिसने अपनी विरासत के प्रति समाज के विश्वास को कमजोर किया और हीन भावना को बढ़ावा दिया। श्री शाह ने विश्वास व्यक्त किया कि वर्तमान नेतृत्व में एशियाटिक सोसाइटी देश भर में भारत की ज्ञान परंपराओं को संजोने और उनका प्रसार करने में अधिक बड़ी भूमिका निभायेगी।

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