पटना, जुलाई 10 -- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) पटना के न्यूरोसर्जरी विभाग ने चिकित्सा नवाचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए मस्तिष्क की न्यूनतम चीरे वाली (मिनिमली इनवेसिव) सर्जरी के लिए एक स्वदेशी पेटेंटेड ट्यूबुलर ब्रेन रिट्रैक्टर विकसित किया है। यह अत्याधुनिक उपकरण एंडोस्कोपिक ब्रेन सर्जरी के साथ साथ न्यूरोनेविगेशन और रोबोटिक तकनीक से भी आसानी से जुड़ सकता है जिससे बेहद छोटे चीरे के माध्यम से अत्यधिक सटीक मस्तिष्क सर्जरी संभव होगी।
यह नवाचार मस्तिष्क के गहरे हिस्सों में स्थित ट्यूमर, ब्रेन हैमरेज तथा कुछ जटिल रीढ़ संबंधी रोगों के उपचार को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित, कम जटिल और किफायती बनाएगा। पारंपरिक ओपन ब्रेन सर्जरी में जहां खोपड़ी में बड़ा चीरा लगाना पड़ता है और स्वस्थ मस्तिष्क ऊतकों पर अधिक प्रभाव पड़ता है, वहीं यह स्वदेशी उपकरण अत्यंत संकरे मार्ग से रोगग्रस्त हिस्से तक पहुंचकर स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम क्षति पहुंचाता है।
इस तकनीक से मरीजों को छोटा ऑपरेशन घाव, कम रक्तस्राव, शीघ्र स्वास्थ्य लाभ, अस्पताल में कम समय तक भर्ती रहने, न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं के कम जोखिम तथा सामान्य जीवन में जल्दी वापसी जैसे अनेक लाभ मिलेंगे।
इस उपकरण की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुउपयोगिता है। सर्जरी की आवश्यकता के अनुसार इसे फ्लोटिंग और फिक्स्ड दोनों प्रकार के ट्यूबुलर रिट्रैक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही, न्यूरोनेविगेशन और रोबोटिक प्लेटफॉर्म के साथ इसका समन्वय सर्जनों को 1-2 मिलीमीटर की सटीकता के साथ ऑपरेशन करने में सक्षम बनाता है जो मस्तिष्क जैसी संवेदनशील संरचनाओं की सर्जरी में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पूरी तरह भारत में विकसित यह स्वदेशी उपकरण आयातित उपकरणों की तुलना में 80-90 प्रतिशत तक कम लागत में तैयार किया जा सकता है। इससे न्यूनतम चीरे वाली ब्रेन सर्जरी की कुल लागत में 30-40 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है जिससे अत्याधुनिक न्यूरोसर्जरी देश के अधिक से अधिक मरीजों की पहुंच में आ सकेगी।
इस अभिनव ट्यूबुलर ब्रेन रिट्रैक्टर का पेटेंट भारत सरकार द्वारा डॉ. विकास चंद्र झा, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, न्यूरोसर्जरी विभाग, एम्स पटना को प्रदान किया गया है। इसके तकनीकी डिजाइन, सुरक्षा और चिकित्सीय प्रभावशीलता पर आधारित शोध एक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त जर्नल में भी प्रकाशित हो चुका है जो इसकी वैज्ञानिक विश्वसनीयता और वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
इस परियोजना की परिकल्पना और नेतृत्व डॉ. विकास चंद्र झा ने किया। इस नवाचार को साकार करने में न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ. नितीश, डॉ. विवेक सारण सिन्हा, डॉ. गौरव, डॉ. राहुल और डॉ. संगम के साथ-साथ एनेस्थीसियोलॉजी विभाग तथा संस्थान प्रशासन का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. (ब्रिग) डॉ. राजू अग्रवाल ने इस उपलब्धि पर पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह नवाचार 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' की भावना को सशक्त करता है। उन्होंने कहा कि एम्स पटना भविष्य में भी ऐसे स्वदेशी, विश्वस्तरीय और किफायती चिकित्सा उपकरणों के विकास को प्रोत्साहित करता रहेगा, जिससे मरीजों की सुरक्षा बढ़े, उपचार अधिक प्रभावी बने और स्वास्थ्य सेवाएं आमजन तक कम लागत में पहुंच सकें।
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