श्रीगंगानगर , मार्च 06 -- राजस्थान में गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद शुरू होने से पहले प्रक्रिया में अचानक किये गये संचालन बदलाव ने व्यापारियों और सरकार के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है।
व्यापारियों का आरोप है कि पंजाब का तरीका अपनाने से मंडियों में भारी दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी, जिससे वे सरकारी खरीद से पूरी तरह पीछे हटने को मजबूर हो सकते हैं। इस टकराव को टालने के लिए राजस्थान खाद्य व्यापार संघ के शिष्टमंडल ने शुक्रवार को जयपुर में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सुमित गोदारा से मुलाकात की। शिष्टमंडल ने मंत्री को नये पैटर्न से उत्पन्न होने वाली व्यावहारिक समस्याओं से विस्तार से अवगत कराया। बैठक में मंत्री ने दो-तीन दिन में समस्या का समाधान करवाने का आश्वासन दिया।
राजस्थान खाद्य व्यापार संघ के बीकानेर संभाग प्रभारी रतनलाल गोयल ने बताया कि बातचीत काफी सकारात्मक रही। मंत्री ने पूरी गंभीरता से हमारी बात सुनी और आश्वासन दिया कि जल्द ही इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई की जाएगी। अगर सरकार ने हमारी समस्याओं का समाधान नहीं किया, तो व्यापारी गेहूं की सरकारी खरीद में सहयोग नहीं कर पाएंगे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस वर्ष राजस्थान सरकार ने गेहूं खरीद की संचालन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है, जो पंजाब के मॉडल से प्रेरित है। पंजाब में ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की कमी के कारण सरकार केंद्र बिंदु पर व्यापारियों को संचालन का पूरा जिम्मा सौंप देती है। इसमें गेहूं की तौल, बोरियों में भरना, सिलाई और वाहनों में लोडिंग तक की जिम्मेदारी व्यापारियों की होती है और पंजाब सरकार इस खर्च की भरपाई भी व्यापारियों को कर देती है।
दूसरी ओर राजस्थान की स्थिति पूरी तरह अलग है। यहां पंजाब जैसी केंद्र बिंदु व्यवस्था नहीं है। गेहूं सीधे मंडियों में आता है। वर्षों से संचालन का सारा काम खरीद एजेंसियां भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), तिलम संघ और राजफैड अपने ठेकेदारों के जरिए करवाती रही हैं। व्यापारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं होता।
व्यापारियों की मुख्य आपत्ति यह है कि राजस्थान की मंडियों में गेहूं के साथ सरसों, जौ और चना भी एक साथ आता है जबकि पंजाब में सिर्फ गेहूं आता है। इसलिए वहां कोई समस्या नहीं होती। यहां व्यापारियों के पास श्रमिकों की भारी कमी हो जाएगी, क्योंकि वे पहले सरसों,जौ और चना की ज्यादा आढ़त वाली फसलों को प्राथमिकता देंगे।
दूसरी बड़ी समस्या यह है कि अगर व्यापारियों को संचालन संभालना पड़ा तो उन्हें मजदूरों के लिए ईएसआई, बीमा और पीएफ के लाइसेंस लेने होंगे। ये लाइसेंस जल्दी नहीं मिलते और इसमें भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ जाएगी।
तीसरी समस्या आर्थिक बोझ की है। सरकार प्रति क्विंटल 23 रुपये संचालन खर्च देने को तैयार है, लेकिन वास्तविक खर्च इससे ज्यादा हुआ तो अंतर व्यापारियों को खुद उठाना पड़ेगा जो उनके लिए बड़ा नुकसान होगा। एक व्यापारी ने स्पष्ट कहा कि बेहतर यही है कि राजस्थान में पुरानी प्रक्रिया से हीखरीद जारी रहे, क्योंकि नया मॉडल यहां लागू नहीं हो सकता।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित