रांची , अगस्त 25 -- झारखंड कांग्रेस भवन रांची में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने आज कांग्रेस भवन में आयोजित प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुऐ कहा की एमएमडीआर संशोधन विधेयक झारखंड के आर्थिक हितों, राज्यों के संवैधानिक अधिकारों और संघीय ढांचे पर गंभीर हमला है।

श्री सहाय ने केंद्र सरकार से 10 सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि झारखंड खनिज संपदा से देश को ऊर्जा और औद्योगिक विकास देता है, लेकिन जब उसी खनिज संपदा से राज्य अपने विकास के लिए राजस्व जुटाना चाहता है तो केंद्र सरकार उसके अधिकार सीमित करने की कोशिश कर रही है।

श्री सहाय ने कहा कि "एमएमडीआर बिल सिर्फ खनन का कानून नहीं है, यह झारखंड की आर्थिक और संघीय स्वायत्तता का सवाल है। केंद्र सरकार स्पष्ट करे कि अगर झारखंड के संभावित Rs.14,000 करोड़ के मिनरल बेयरिंग लैंड ses पर रोक लगती है, तो इस राशि की भरपाई कौन करेगा?"उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार के 2026-27 के बजट में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से लगभग Rs.14,000 करोड़ के राजस्व का अनुमान है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि केंद्र सरकार इस महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत को सीमित क्यों करना चाहती है।

उन्होंने केंद्र सरकार से सवाल किया- झारखंड के लगभग Rs.14,000 करोड़ के संभावित राजस्व पर केंद्र की नजर क्यों है? राज्य की जमीन और खनिज से मिलने वाले राजस्व पर राज्य का अधिकार सीमित करने की जरूरत क्यों पड़ी? झारखंड की जमीन, झारखंड के खनिज और पर्यावरणीय-सामाजिक बोझ झारखंड उठाए, लेकिन फैसला दिल्ली क्यों करे? यह कैसा संघीय ढांचा है जिसमें खनिज प्रभावित राज्य अपने विकास के लिए राजस्व संबंधी निर्णय भी स्वतंत्र रूप से नहीं ले सकता? सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले के बाद यह संशोधन क्यों लाया गया?राज्यों के खनिज अधिकार और मिनरल बेयरिंग लैंड सेस पर कराधिकार को लेकर संविधान पीठ के फैसले के बाद केंद्र सरकार को ऐसा कानून लाने की जरूरत क्यों महसूस हुई जो राज्यों की शक्ति को सीमित करता है? अगर राज्य का राजस्व सीमित होगा तो Rs.14,000 करोड़ की भरपाई कौन करेगा?केंद्र सरकार लिखित रूप से बताए कि झारखंड के संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई किस माध्यम से होगी। आदिवासी और खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास कैसे होगा?सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पुनर्वास और रोजगार के लिए खनन प्रभावित क्षेत्रों को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत है। राज्य के राजस्व स्रोत कमजोर होंगे तो इसका सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं क्षेत्रों को होगा। राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर हमला क्यों? क्या केंद्र सरकार चाहती है कि राज्यों के पास अपने प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित विकास कार्यों के लिए वित्तीय निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी नहीं रहे?पुराने बकाये को समाप्त करने का प्रावधान क्यों?जो राज्य स्तरीय लेवी पहले से देय हैं, उनके unpaid अनपेड या अनडिस्कवर्ड ड्यूज को अमान्य करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह राज्यों के वित्तीय अधिकारों को पीछे से कमजोर करने का प्रयास नहीं है? भाजपा के झारखंड सांसद स्पष्ट करें-वे झारखंड के साथ हैं या दिल्ली के फैसले के साथ?झारखंड के भाजपा सांसदों को जनता के सामने बताना चाहिए कि वे राज्य के संभावित Rs.14,000 करोड़ के राजस्व और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संसद में आवाज उठाएंगे या नहीं। केंद्र सरकार 90 प्रतिशत राजस्व राज्यों को मिलने की बात कहकर असली मुद्दे से ध्यान क्यों भटका रही है?कुल खनन भुगतान में राज्यों को मिलने वाली हिस्सेदारी और राज्यों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में अतिरिक्त कर/सेस लगाने की शक्ति दो अलग-अलग विषय हैं। दोनों को मिलाकर जनता को भ्रमित नहीं किया जा सकता। आखिर झारखंड के खनिज पर पहला अधिकार किसका है?जिस राज्य की जमीन से कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिज निकलते हैं, क्या उस राज्य को अपने विकास के लिए उचित राजस्व तय करने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए?श्री सहाय ने कहा कि Rs.14,000 करोड़ कोई मामूली रकम नहीं है। यदि इसे झारखंड के कुल बजटीय व्यय के संदर्भ में देखा जाए तो यह राज्य के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राशि है। इस राशि से जहाँ हम मैया सम्मान योजना चलाकर राज्य की कमजोर बहनों को माता को आर्थिक रूप से सफलता प्रदान कर रहे हैं उन्होंने कहा कि खनिज संपदा झारखंड की है तो उसके लाभ में सबसे पहला और न्यायसंगत हिस्सा झारखंड की जनता का होना चाहिए।

उन्होंने कहा, "झारखंड देश को खनिज देता है, लेकिन बदले में उसे बेरोजगारी, विस्थापन, प्रदूषण और पिछड़ेपन का बोझ नहीं दिया जा सकता। केंद्र सरकार को खनिज संपदा से होने वाले राजस्व में राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करना होगा।"पूर्व केंद्रीय मंत्री ने झारखंड के सभी राजनीतिक दलों और विशेषकर राज्य के भाजपा सांसदों से अपील की कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर झारखंड के आर्थिक हित और संघीय अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हों।

उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि एमएमडीआर संशोधन पर झारखंड के हितों को स्पष्ट रूप से सुरक्षित किया जाए और राज्य के संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई की ठोस गारंटी दी जाए।

आज क़े इस प्रेस बर्ता में राकेश सिन्हा, सोनल शांति,कमल ठाकुर,उज्जल तिवारी, उपस्थित थे।

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