नैनीताल , मार्च 26 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग -74 के लिए भूमि अधिग्रहण मामले में मुआवजे की राशि बढ़ाने की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर कानूनी उपायों का पालन नहीं किया गया तो सीधे रिट याचिका के माध्यम से राहत पाना संभव नहीं होगा। अदालत ने ऊधम सिंह नगर के जिलाधिकारी द्वारा समय सीमा के आधार पर खारिज किए गये आवेदनों के खिलाफ दायर याचिकाओं को सुनने से इनकार कर दिया है। इस मामले में विगत 09 मार्च को सुनवाई हुई, लेकिन आदेश की प्रति आज प्राप्त हुई।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास 'मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996' की धारा 34 के तहत जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील करने का एक वैकल्पिक वैधानिक विकल्प उपलब्ध है। चूंकि कानून में पहले से ही एक स्पष्ट उपचार मौजूद है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सीधे उच्च न्यायालय में रिट याचिकाएं विचारणीय नहीं मानी जा सकतीं। इस तकनीकी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
यह पूरा विवाद काशीपुर से सितारगंज के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 74 के चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित की गई भूमि से जुड़ा हुआ है। इस मामले में सक्षम प्राधिकारी द्वारा वर्ष 2015 और 2017 में मुआवजा अवार्ड पारित किए गए थे। याचिकाकर्ता श्रवण सिंह,जसवीर सिंह,राजेंद्र कुमार सहित अन्य लोगों का तर्क था कि वित्तीय तंगी और कानूनी जानकारी के अभाव के कारण वे समय पर अवार्ड को चुनौती नहीं दे पाए और सात साल की देरी के बाद उन्होंने मुआवजे में वृद्धि के लिए आवेदन किया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि 'राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम' में मुआवजे की वृद्धि के लिए आवेदन करने की कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं है। उन्होंने 'मध्यस्थता अधिनियम' की धारा 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि धारा 43 (जो समय सीमा की बात करती है) अन्य अधिनियमों के तहत होने वाली मध्यस्थता पर लागू नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, जब मूल कानून मौन हो, तो सात साल बाद भी आवेदन स्वीकार किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू करने के लिए 'परिसीमा अधिनियम' का अनुच्छेद 137 लागू होता है, जिसके तहत केवल 3 वर्ष की समय सीमा निर्धारित है। उन्होंने केरल उच्च न्यायालय के हालिया फैसलों का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया था कि कलेक्टर के निर्णय के खिलाफ रिट याचिका विचारणीय नहीं है।
न्यायालय कहा कि वर्तमान में यह कानूनी प्रश्न कि "क्या मध्यस्थता की कार्यवाही पर परिसीमा अधिनियम लागू होगा या नहीं", अभी भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। ऐसी स्थिति में जबकि मामला अभी शीर्ष अदालत में लंबित है, उच्च न्यायालय ने मौजूदा कानूनी ढांचे और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों को प्राथमिकता देना उचित समझा।
न्यायमूर्ति थपलियाल ने ऊधम सिंह नगर के कलेक्टर के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित जिला न्यायालय जाने की छूट दी है।
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