चंडीगढ़ , अक्टूबर 29 -- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के अधिवक्ता हेमंत कुमार ने राज्य लोक सेवा आयोग (एचपीएससी) के (सेवा की शर्तें) विनियमन, 2018 में निर्धारित शपथ के प्रारूप की भाषा और विधिक स्पष्टता की समीक्षा करने की मांग की है।

आयोग के नवनियुक्त चेयरमैन सतीश कुमार सैनी की शपथ के प्रारूप को लेकर कानूनी सवाल उठे हैं।

अधिवक्ता के अनुसार, 17 दिसंबर 2018 को अधिसूचित विनियमन के परिशिष्ट में निष्ठा, पद और गोपनीयता की शपथ के प्रारूप में 'ईश्वर' शब्द का उल्लेख नहीं है। इसके अलावा, प्रारूप में आयोग के चेयरमैन के बजाय सदस्य के रूप में पद ग्रहण करने की शब्दावली इस्तेमाल की गई है।

उन्होंने कहा कि संवैधानिक शपथों में सामान्यतः ईश्वर के नाम पर शपथ लेने अथवा सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करने का विकल्प होता है। ऐसे में 'सत्यनिष्ठा से शपथ' जैसी शब्दावली की विधिक स्पष्टता पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से पूछा कि चेयरमैन पद के लिए अलग प्रारूप निर्धारित क्यों नहीं किया गया।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 316 का हवाला देते हुए कहा कि आयोग के चेयरमैन और सदस्यों के पदों से संबंधित प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए शपथ के प्रारूप में स्पष्टता जरूरी है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के स्टेट ऑफ मैसूर बनाम आर वी बिदाप मामले में 3 सितंबर 1973 को दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि संविधान की तीसरी अनुसूची में आयोग के चेयरमैन और सदस्यों के लिए अलग शपथ प्रारूप नहीं है। ऐसे में संबंधित सेवा विनियमों में निर्धारित भाषा का महत्व बढ़ जाता है। वर्ष 2018 में हरियाणा सरकार ने 1972 के पुराने विनियमों की जगह नए विनियम अधिसूचित किए थे।

श्री हेमंत कुमार ने राज्य सरकार से शपथ के प्रारूप की समीक्षा कर आवश्यक संशोधन करने की मांग की। उन्होंने कहा कि नियमों की भाषा में स्पष्टता से नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ेगी और भविष्य में संभावित कानूनी विवादों को कम करने में मदद मिलेगी।

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