रायपुर , अप्रैल 03 -- छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को लेकर राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी पहल और उस पर उठे राजनीतिक सवालों के बीच नई बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार ने केंद्र के उपक्रम एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के साथ समझौता कर 1051 स्वास्थ्य संस्थानों में आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया है, वहीं कांग्रेस चिकित्सा प्रकोष्ठ ने इस पूरी प्रक्रिया को नियम विरुद्ध बताते हुए पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।

राज्य शासन के अनुसार आम नागरिकों को सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जांच सुविधा देने के उद्देश्य से एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के साथ एमओयू किया गया है। इस योजना के तहत 'अटल आरोग्य लैब' के रूप में एक व्यापक जांच नेटवर्क तैयार किया जाएगा। इसकी शुरुआत 14 अप्रैल 2026 को जगदलपुर से पहली लैब के शुभारंभ के साथ होगी।

स्वास्थ्य मंत्री के कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ इंटीग्रेटेड डायग्नोस्टिक मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से "हब एंड स्पोक" मॉडल पर आधारित नेटवर्क विकसित किया जाएगा। इसमें स्टेट रेफरल लैब, 4 संभागीय लैब, 33 जिला लैब, 12 सिविल अस्पताल लैब और 187 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर की लैब शामिल होंगी, जबकि 814 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सैंपल कलेक्शन सेंटर के रूप में कार्य करेंगे। इस तरह कुल 1051 स्वास्थ्य संस्थानों को इस नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।

योजना के अंतर्गत जिला अस्पतालों में 134, सिविल अस्पतालों में 111, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 97 और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 64 प्रकार की जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। पैथोलॉजी से लेकर मॉलिक्यूलर जांच तक की सेवाएं एक ही सिस्टम के तहत मिलेंगी। जांच रिपोर्ट सीधे मरीजों के मोबाइल पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। साथ ही एक केंद्रीकृत मॉनिटरिंग डैशबोर्ड और कमांड सेंटर स्थापित कर सेवाओं की गुणवत्ता और समयबद्धता पर नजर रखने की बात कही गई है। योजना को चरणबद्ध तरीके से लागू कर अगले तीन माह में पूरे नेटवर्क को क्रियाशील करने का लक्ष्य रखा गया है।

इधर कांग्रेस चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता ने इस पहल पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उन्होंने कहा कि शासकीय अस्पतालों में पैथोलॉजी जांच का कार्य एचएलएल को सीधे सौंपना सामान्य वित्तीय नियमावली 2017 और केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। उनके अनुसार किसी भी सार्वजनिक उपक्रम को बिना निविदा प्रक्रिया के सीधे काम देना सामान्यतः प्रतिबंधित है और इसके लिए पारदर्शी प्रतिस्पर्धा आवश्यक होती है।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि नियमों के तहत केवल विशेष परिस्थितियों जैसे आपदा, एकमात्र उपलब्ध स्रोत या बार-बार टेंडर असफल होने की स्थिति में ही नामांकन आधार पर कार्य दिया जा सकता है, जबकि वर्तमान मामले में ऐसी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि योजना लागू करने से पहले किसी प्रकार का गैप एनालिसिस नहीं किया गया और न ही मौजूदा संसाधनों व प्रस्तावित सेवाओं के बीच तुलना प्रस्तुत की गई है।

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