चंडीगढ़ , अगस्त 21 -- ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने हरियाणा इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (एचईआरसी) से गुरुग्राम और नूंह जिलों में समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देने से संबंधित याचिका संख्या 30 पर विशेषज्ञ समिति की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
एआईपीईएफ के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने शुक्रवार को एचईआरसी को लिखे पत्र में कहा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट की पूरी प्रति, जिसमें उसके निष्कर्ष और सिफारिशें शामिल हैं, मामले से जुड़े सभी पक्षों और निवेशकों को उपलब्ध करायी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट को केवल आंतरिक प्रशासनिक दस्तावेज मानकर इससे प्रभावित हितधारकों के अधिकारों और हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
श्री दुबे ने मांग की कि सभी प्रभावित पक्षों को विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों और सिफारिशों पर लिखित आपत्ति या राय रखने तथा मौखिक सुनवाई का उचित अवसर दिया जाये। एचईआरसी पहले स्पष्ट कर चुका है कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट केवल सिफारिशी होगी और इससे इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 के तहत आयोग की निर्णय लेने की वैधानिक शक्तियां प्रभावित या सीमित नहीं होंगी। एआईपीईएफ के अनुसार प्रस्तावित समानांतर वितरण लाइसेंस का मामला केवल आवेदक के व्यावसायिक हितों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ समिति को उपभोक्ताओं के हितों और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच करने का भी निर्देश दिया गया था। इनमें मौजूदा अनुबंध, सुरक्षा जमा, बकाया राशि, मीटरिंग, बिजली आपूर्ति की निरंतरता, शिकायतों के निवारण और उपभोक्ताओं के दूसरी जगह जाने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
फेडरेशन ने आयोग से यह सुनिश्चित करने की मांग की कि प्रस्तावित समानांतर वितरण लाइसेंसपर कोई अंतिम आदेश तब तक पारित न किया जाये, जब तक सभी प्रभावित हितधारकों को आयोग द्वारा विचार की जाने वाली आवश्यक जानकारी पर अपनी बात रखने का पूर्ण, निष्पक्ष और सार्थक अवसर नहीं दिया जाता। एआईपीईएफ के मीडिया सलाहकार वी के गुप्ता ने कहा कि इंजीनियरों ने आयोग से समानांतर वितरण लाइसेंस की याचिका को खारिज करने और पारदर्शिता, निष्पक्षता तथा व्यापक जनहित को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है।
उन्होंने कहा कि एआईपीईएफ ट्रांसमिशन सिस्टम में टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग के जरिए बिजली क्षेत्र के निजीकरण, समानांतर वितरण लाइसेंस के प्रस्तावों, कृषि डिस्कॉम के गठन और बिजली परिसंपत्तियों के मोनेटाइजेशन का विरोध करता है। फेडरेशन का तर्क है कि ऐसी नीतियों से सार्वजनिक धन से तैयार बुनियादी ढांचे पर असर पड़ सकता है, राज्य की बिजली वितरण कंपनियों पर बोझ बढ़ सकता है और आम उपभोक्ताओं के लिए टैरिफ में वृद्धि तथा क्रॉस-सब्सिडी व्यवस्था के कमजोर होने की आशंका है।
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