नयी दिल्ली , मई 19 -- दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। यह याचिका साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में दायर की गई थी, जिसमें उन पर गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप दर्ज हैं।

उमर खालिद ने अपने दिवंगत चाचा की शोक सभा (चेहलुम) में शामिल होने और अपनी मां की देखभाल के लिए 15 दिनों के लिए जमानत मांगी थी, लेकिन कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत की मांग को नामंजूर कर दिया।

राहत देने से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि खालिद को पहले अंतरिम जमानत मिली थी और उन्होंने सभी शर्तों का पालन किया था, इसे हर बार जमानत देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायाधीश ने कहा कि शोक सभा की रस्म में शामिल होना कोई ऐसी परिस्थिति नहीं है जिसे टाला न जा सके। अगर रिश्ता बेहद करीबी होता, तो खालिद अपने चाचा की मौत के तुरंत बाद जमानत मांगते, न कि इतने लंबे समय के बाद।

खालिद की मां की बीमारी को लेकर अदालत ने कहा कि वहां खालिद की मौजूदगी की कोई सख्त जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी देखभाल के लिए उनकी बहनें और पिता मौजूद हैं। अदालत ने सरकारी वकील की इस बात का भी जिक्र किया कि दो जून को खालिद की मां का होने वाला सर्जरी शरीर से गांठ हटाने की एक छोटी सी प्रक्रिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, "इन कारणों को उचित न पाते हुए, अदालत इस तरह की राहत देना ठीक नहीं समझती है।"दिल्ली पुलिस ने इस जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया था। पुलिस ने दलील दी कि मामले की संवेदनशीलता और इसके गंभीर प्रभाव को देखते हुए उमर खालिद को रिहा करने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। सरकारी वकीलों ने यह भी कहा कि अंतरिम जमानत देने के लिए कोई असाधारण या आपातकालीन कारण मौजूद नहीं है।

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