नैनीताल , मार्च 28 -- उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (उपनल) कर्मियों के विनियमितिकरण के मामले में राज्य सरकार अभी पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पायी है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उपनल के माध्यम से कार्यरत फार्मासिस्टों के विनियमितीकरण के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा है।
कोर्ट ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में दिये गये निर्देशों के अनुपालन में अभी तक क्या क़दम उठाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में फार्मासिस्ट के पदों पर संविदा पर तैनात दीपक कुमार व अन्य की ओर से दायर विशेष याचिका पर सुनवाई के बाद ये निर्देश जारी किए। अपील पर सुनवाई विगत 25 मार्च को हुई लेकिन आदेश की प्रति आज मिली।
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उच्च न्यायालय ने कुंदन सिंह बनाम राज्य सरकार मामले में उपनल कर्मियों के विनियमितिकरण के निर्देश दिए थे लेकिन इस दौरान चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड ने इन पदों को भरने के लिए विज्ञापन जारी कर दिया। जिससे उनके भविष्य अधर में लटक गया है।
आगे दलील दी गई कि उच्च न्यायालय ने उपनल कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित करने के निर्देश दिए थे। इस आदेश को राज्य सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई लेकिन शीर्ष अदालत ने सरकार को कोई राहत नहीं दी है। आगे कहा गया कि एकलपीठ ने उनके मामले में सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सरकार ने अदालती आदेशों के अनुपालन के लिए सात सदस्यीय समिति का गठन किया लेकिन उसकी सिफारिशें केवल न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते तक ही सीमित रहीं।
आखिरकार खंडपीठ ने इस प्रकरण को 'मंजुल मेहता बनाम उत्तराखंड राज्य' से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ते हुए अगली सुनवाई के लिए 08 अप्रैल की तिथि तय कर दी है। अदालत ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि कुंदन सिंह बनाम राज्य सरकार मामले में विनियमितीकरण को लेकर दिए गए निर्देश के अनुपालन में अभी तक क्या कदम उठाए गए हैं।
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