रामनगर , अप्रैल 16 -- देश की आजादी के 79 साल पूरे कर चुका है, विकास के दावे भी खूब किए जाते हैं लेकिन हकीकत आज भी पहाड़ों में कहीं न कहीं दम तोड़ती नजर आती है। यह तस्वीर पर्वतीय राज्य में नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र के रामपुर की है जहां आज भी लोग अपनी जान हथेली पर रखकर रोजाना आवाजाही करने को मजबूर हैं।
रामनगर से महज 27 किलोमीटर दूर पाटकोट गांव और उससे करीब दो-तीन किलोमीटर आगे रामपुर गांव. यहां करीब 800 ग्रामीणों की जिंदगी एक जर्जर लकड़ी के पुल पर टिकी है ये पुल कालीगाड़ नदी के ऊपर बना है जिसे ग्रामीण हर साल बरसात के बाद खुद ही मरम्मत कर तैयार करते हैं.जैसे ही बारिश का मौसम आता है. ये नदी उफान पर आ जाती है. और ये लकड़ी का पुल किसी बड़े खतरे की तरह सामने खड़ा हो जाता है लेकिन मजबूरी ऐसी कि ग्रामीणों को इसी पुल से रोज गुजरना पड़ता है। सबसे ज्यादा खतरा उन बच्चों को है जो रोजाना इसी रास्ते से होकर राजकीय इंटर कॉलेज पाटकोट पढ़ने जाते हैं करीब 50 से 55 बच्चे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस पुल को पार करते हैं।
ग्रामीण महेश चंद्र का कहना है हमारे बच्चों को रोज इसी पुल से जाना पड़ता है डर लगा रहता है कि कहीं कोई हादसा न हो जाएसिर्फ पढ़ाई ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की जरूरतें भी इस खतरे से होकर गुजरती हैं राशन की दुकान पाटकोट में है,ऐसे में ग्रामीणों को भारी सामान सिर पर रखकर इसी पुल से पार करना पड़ता है.इतना ही नहीं जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए भी इसी जर्जर पुल का सहारा लेना पड़ता है कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि जान पर बन आती हैग्रामीण बताते हैं कि अब तक दो बार मोटरसाइकिल सवार इस नदी को पार करते वक्त बह चुके हैं लेकिन इसके बावजूद हालात जस के तस हैं।
गौरतलब है कि जुलाई 2025 में प्रशासन ने इस समस्या को देखते हुए कालीगाड़ नदी पर स्थायी पुल बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था करीब 25 लाख रुपए की लागत से पुल निर्माण की बात कही गई और इसे जिला योजना के तहत मंजूरी के लिए भेजा गया,लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई काम शुरू नहीं हो पाया है।
इस पर गांव के ही सामाजिक कार्यकर्ता महेश चंद्र कहते है पुल का प्रस्ताव बना पैसा भी स्वीकृत हुआ लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ बरसात आने वाली है और खतरा बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत चुनाव के दौरान भी इस मुद्दे को उठाया गया लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला अब एक बार फिर बरसात का मौसम सिर पर है और गांव के लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है।
सवाल ये है कि आखिर कब तक ये ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर इस 'मौत के पुल' को पार करते रहेंगे और कब प्रशासन नींद से जागकर इस पुल का निर्माण शुरू करेगा फिलहाल पूरे गांव की निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिकी हैं।
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