देहरादून , मई 09 -- देवभूमि उत्तराखंड के विकास में जहां केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभाग अपना योगदान दे रहे हैं, वहीं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी) का योगदान भी कमतर नहीं है। यदि कहा जाय कि सभी निर्माण सम्बन्धी विकास परियोजनाओं में इस विभाग की पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है।

शनिवार को देहरादून स्थित आईआईएसडब्ल्यूसी के मुख्यालय में इससे संबंधित जानकारी महानिदेशक डॉ भगवती प्रसाद भट्ट ने साझा की। उन्होंने बताया कि आईआईएसडब्ल्यूसी की स्थापना 01 अप्रैल 1974 को हुई थी। इसके आठ अनुसंधान केंद्र पूरे भारत में फैले हुए हैं, जो विशिष्ट क्षेत्रीय अधिदेशों के तहत मृदा अपरदन की समस्याओं का समाधान करते हैं। उन्होंने बताया कि तीन केंद्र आगरा, कोटा, वासद बीहड़ों की समस्या पर कार्य करते हैं। दतिया केंद्र बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए, बेल्लारी केंद्र काली मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिए, चंडीगढ़, ऊटी और देहरादून केंद्र पहाड़ी एवं पर्वतीय क्षेत्रों से जुडी समस्याओं पर कार्य करते है। उन्होंने बताया जबकि कोरापुट केंद्र "झूम खेती" (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) से संबंधित कार्यों के लिए समर्पित हैं।

डॉ भट्ट के अनुसार, संस्थान ने अपने आठ क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्रों के साथ मिलकर, मृदा और जल संरक्षण तथा वाटरशेड प्रबंधन के क्षेत्र में एकीकृत अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास, क्षमता निर्माण और नीतिगत सहयोग के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान करने में एक अहम भूमिका निभाई है। संस्थान ने मृदा अपरदन नियंत्रण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, भूमि बहाली और निम्नीकृत-पारिस्थितिक तंत्रों (डिग्रेडेड इको सिस्टम) के पुनर्वास के लिए वैज्ञानिक रूप से मान्य प्रौद्योगिकियों और निर्णय-सहायक प्रणालियों को विकसित और उनका प्रदर्शन किया है। उन्होंने बताया कि इन उपायों के परिणामस्वरूप मृदा के नुकसान और जल बहाव में उल्लेखनीय कमी आई है, मृदा की नमी और जल की उपलब्धता में सुधार हुआ है, कृषि उत्पादकता बढ़ी है और किसानों की आय मजबूत हुई है; साथ ही, इन्होंने पारिस्थितिक तंत्र की बहाली और जलवायु अनुकूलन क्षमता को बढ़ाने में भी योगदान दिया है।

आईआईएसडब्ल्यूसी महानिदेशक ने बताया कि उत्तराखंड के विकास में प्रधानमंत्री की स्वप्निल (ड्रीम प्रोजेक्ट) चारधाम परियोजना के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति में संस्थान प्रतिनिधित्व करता है। जिसमें पर्वतीय क्षेत्र में सड़कों के चौड़ीकरण से पहले संस्थान ने सम्बन्धित क्षेत्रों की मृदा और जल संरक्षण दोनों के आंकलन के बाद ही, अपनी स्वीकृति दी। उन्होंने बताया कि हमारे देश में हर साल मिट्टी का कुल कटाव 5.11 बिलियन टन आँका गया है, जिसमें से 34.1 फीसदी जलाशयों में जमा हो जाता है। जबकि 22.9 फीसदी समुद्रों में बह जाता है और 43 फीसदी मुख्य भूभाग में एक जगह से दूसरी जगह चला जाता है।

डाॅ. भट्ट ने बताया कि उत्तराखंड में कलिमाटी मॉडल और सहभागी भूमिगत जल संचयन कार्यक्रम के तहत, देहरादून जिले के रायपुर ब्लॉक के चार गाँवों के कुल 423 किसान परिवारों को शामिल किया गया। ताकि 1156 हेक्टेयर बंजर ज़मीन का सुधार किया जा सके। उन्होंने बताया कि आजीविका को बेहतर बनाने के उद्देश्य से, सहभागी दृष्टिकोण अपनाते हुए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) पर आधारित 29 उपाय लागू किए गए। जिसमें इस परियोजना का मुख्य परिणाम यह रहा कि खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 215 फीसदी और पारिवारिक आय में 115 फीसदी की वृद्धि हुई। उन्होंने बताया कि साथ ही, लागू किए गए उपायों की निरंतरता और सामुदायिक प्रबंधन भी इसके प्रमुख परिणाम थे।

आईआईएसडब्ल्यूसी महानिदेशक ने बताया कि देहरादून में ही लांघा-सहभागी जल संसाधन विकास और प्रबंधन कार्यक्रम में देहरादून जिले के विकासनगर ब्लॉक के चार गाँवों के कुल 321 किसान परिवारों को शामिल किया गया, ताकि 423 हेक्टेयर निम्नीकृत वर्षा-आधारित ज़मीन का उपचार किया जा सके। इसमें आजीविका को बेहतर बनाने के उद्देश्य से, सहभागी दृष्टिकोण के माध्यम से 23 एनआरएम आधारित उपाय लागू किए गए। उन्होंने बताया कि इसमें सिंचित क्षेत्र में 174 प्रतिशत, फसल उत्पादन में 191 प्रतिशत और वार्षिक पारिवारिक आय में लगभग 194 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

उत्तराखंड राज्य के विकास पर बातचीत में डॉ भट्ट ने बताया कि संस्थान ने इनके अलावा, देहरादून के पर्यटन स्थल सहस्रधारा में 64 हेक्टेयर क्षेत्र में एक सुधार परियोजना लागू की। जिसमें मिट्टी और पानी के संरक्षण के लिए अलग-अलग उपाय अपनाए गए, जिनमें जैव इंजीनियरिंग के उपायों को भी शामिल किया गया। उन्होंने बताया कि इन उपायों को लागू करने के परिणामस्वरूप, मिट्टी का कटाव 550 से घटकर 6 टन/हेक्टेयर/वर्ष रह गया, और मॉनसून के दौरान बहने वाले पानी (रनऑफ) में भी 57 से 37 प्रतिशत तक की उल्लेखनीय कमी आई। उन्होंने कहा कि ज़मीन के अंदर ही नमी बनाए रखने के प्रयासों के कारण, जल-ग्रहण क्षेत्र (वायरशेड एरिया) के झरनों में पूरे साल यानी 365 दिन पानी उपलब्ध रहा।

महानिदेशक ने बताया कि इसी तरह राज्य में पलायन रोकने के लिए आईआईएसडब्ल्यूसी की ओर से हटाल-सैंज गांवों में सहभागी झरना जल संचयन और प्रबंधन कार्यक्रम 2013 के दौरान लागू किया गया। जिसमें कुल 187 किसान परिवारों को लाभ मिला। उन्होंने दावा किया कि इससे पानी की उपलब्धता तीन गुना बढ़ गई; अधिक मूल्य वाली फसलों का उत्पादन चार गुना से भी अधिक बढ़ गया, 100 फीसदी हरित ऊर्जा के साथ 76 फीसदी लागत की बचत हुई। साथ ही, किसानों की आय 4.28 गुना बढ़ गई, जिसके परिणामस्वरूप 17 परिवारों का पुनः प्रवासन (रिवर्स माइग्रेशन) हुआ।

डाॅ. भट्ट ने साफ कहा कि रिवर्स पलायन की आईआईएसडब्ल्यूसी की इस परियोजना पर तत्कालीन राज्य सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया, फलस्वरूप इस दिशा में कार्य आगे नहीं बढ़ सका।

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