नैनीताल , अक्टूबर 27 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड जनजाति सलाहकार परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा और सार्वजनिक आचरण से जुड़ी जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को कोई ठोस राहत नहीं दी है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिका को निस्तारित कर दिया है। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना प्रत्यावेदन देने की स्वतंत्रता दी है। साथ ही सक्षम प्राधिकारी को उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2015 की धारा 4(2) के आलोक में उस प्रत्यावेदन पर नौ माह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

याचिका देहरादून निवासी बचना शर्मा की ओर से दायर की गई जो स्वयं अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं। उन्होंने परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा, सार्वजनिक आचरण और अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता सुनिश्चित किए जाने का मुद्दा उठाया।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति सलाहकार परिषद नियमावली, 2014 में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो परिषद के सदस्यों की सत्यनिष्ठा और जनजातीय कल्याण के लिए उनके योगदान को अनिवार्य रूप से विचार में लेने की व्यवस्था करता हो। इसके विपरीत, अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2015 की धारा 4(2) का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि संबंधित समिति के सदस्यों की सत्यनिष्ठा और जनजातियों के कल्याण के लिए किए गए कार्यों को महत्व दिया जाना चाहिए।

याचिका में परिषद के उपाध्यक्ष गीताराम गौड़ का उदाहरण देते हुए उनके विरुद्ध कथित तौर पर करीब 18 से 20 आपराधिक मामलों और शिकायतों के लंबित होने का उल्लेख किया गया।

याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि जनजातीय हितों से जुड़े अहम दायित्व वाले पदों पर नियुक्ति या पदधारण में संबंधित व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा, आचरण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर उचित विचार जरूरी है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित