शिमला , मार्च 02 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सोमवार को शिमला के महापौर और उप महापौर के कार्यकाल को बढ़ाने को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई की।
महापौर सुरेंद्र चौहान और उप-महापौर उमा कौशल के कार्यकाल को ढाई साल से बढ़ा कर पांच साल करने वाले आदेश को अधिवक्ता अंजलि सोनी और भाजपा पार्षदों ने चुनौती दी है।
मामले की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधवालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने करीब ढाई घंटे तक विस्तृत दलीलों को सुना और आगे की सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद गुरुवार तक के लिए स्थगित कर दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर ठाकुर ने अपनी दलीलें पूरी करते हुए तर्क दिया कि कार्यकाल का विस्तार हिमाचल प्रदेश नगर निगम अधिनियम के तहत ढाई साल की निर्धारित वैधानिक अवधि का उल्लंघन करता है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार वर्तमान पदाधिकारियों का कार्यकाल पूरा होने से ठीक पहले जल्दबाजी में अध्यादेश लेकर आयी है। उन्होंने कहा कि महापौर पद के लिए रोटेशन प्रणाली को कार्यकारी कार्रवाई के माध्यम से बीच में नहीं बदला जा सकता।
अधिवक्ता ठाकुर ने आगे तर्क दिया कि अध्यादेश छह महीने की अवधि पूरी होने के बाद पहले ही समाप्त हो चुका है और इसे वैध रूप से किसी नियमित अधिनियम से प्रतिस्थापित नहीं किया गया था। उन्होंने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि राज्यपाल ने पहले पारित किये गये विधेयक को मंजूरी नहीं दी थी और इसे वापस कर दिया था।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से महापौर और उप-महापौर को कामकाज करने से रोकने का भी आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि नये चुनावों की अधिसूचना में देरी को लेकर कई पार्षदों ने विरोध प्रदर्शन भी किया है।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल अनूप रत्न ने तर्क दिया कि मामला अब भी विचाराधीन है और सरकार विधानसभा का सत्र फिर से बुलायेगी, क्योंकि राज्यपाल ने पहले अपनी सहमति नहीं दी थी। उन्होंने शोक का हवाला देते हुए अपनी दलीलें पूरी करने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
मुख्य न्यायाधीश संधवालिया ने टिप्पणी की कि अध्यादेश पहले ही समाप्त हो चुका है और संकेत दिया कि राज्य की दलीलें पूरी होने के बाद उचित दिशा-निर्देशों पर विचार किया जायेगा।
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